🌺कण्णमुण्डपेतिवत्थु🌺 #petavatthu
'सोण्णसोपानफलका...' - यह शास्ता ने श्रावस्ती में विहार करते हुए कण्णमुण्ड प्रेतनी के सम्बंध में कहा।
कहा जाता है कि अतीत में कस्सप बुद्ध जी के समय में किमिल नगर में एक सोतापन्न उपासक था जो पाँच सौ उपासकों के साथ एक ही इच्छा वाला होकर बगीचा लगाना, पुल बनाना, चंक्रमण बनाना आदि पुण्य कर्मों में लगा रहता था, और संघ के लिए विहार बनवाकर उनके साथ समय-समय पर विहार जाता था। उनकी पत्नियाँ भी उपासिका होकर आपस में एकता से माला-गंध-लेप आदि हाथ में लेकर समय-समय पर विहार जाती थीं, और रास्ते में बगीचों और सभाओं आदि में विश्राम करके जाती थीं।
एक दिन कुछ धूर्त (दुष्ट बदमाश) एक सभा में बैठे थे। जब वे स्त्रियाँ वहाँ विश्राम करके गईं, तो उनके रूप-सौंदर्य को देखकर उन पर आसक्त हो गए, और उनके शील-आचार-गुण की सम्पन्नता को जानकर बात उठाई - "इनमें से किसी एक का भी शील तोड़ने में कौन समर्थ है?"
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අනුගාමිකයින්
14 Oct 2026
නවතම පළ කිරීම
उनमें से एक ने कहा - "मैं समर्थ हूँ।" उन्होंने उसके साथ "हजार पर शर्त लगाते हैं" कहकर शर्त लगाई। वह अनेक उपायों से प्रयत्न करता हुआ, जब वे सभा में आईं, तो अच्छी तरह से तनी हुई सात तारों वाली मधुर स्वर वाली वीणा बजाते हुए मधुर ही स्वर से काम-विषयक (कामुक) गीत गाता हुआ, गीत की आवाज़ से उनमें से एक स्त्री का शील भंग कराके उसे व्यभिचारिणी बनाकर उन धूर्तों से हजार जीत लिया। उन धूर्तों ने हजार हारकर उसके पति को बता दिया। पति ने उससे पूछा - "क्या तुम ऐसी हो, जैसा इन पुरुषों ने कहा?"
उसने "मैं ऐसा नहीं जानती" कहकर इनकार किया, और पति के विश्वास न करने पर पास में खड़े कुत्ते को दिखाकर शपथ खाई - "यदि मैंने ऐसा पाप कर्म किया है, तो यह कटे हुए कान वाला कुत्ता जहाँ-जहाँ मैं जन्म लूँ, वहाँ-वहाँ मुझे खाए।"
दूसरी पाँच सौ स्त्रियाँ उस स्त्री को व्यभिचारिणी जानती हुई भी जब "क्या इसने वैसा पाप किया या नहीं किया" करके पूछी गईं, तो "हम ऐसा नहीं जानतीं" कहकर झूठ बोलकर "यदि हम जानती हों, तो भव-भव (भविष्य के जन्मों) में इसी की दासी हों" ऐसी शपथ खा ली।
फिर वह व्यभिचारिणी स्त्री उसी पश्चाताप से जलते हुए हृदय वाली होकर सूख कर थोड़े ही समय में मरकर हिमालय में पर्वतराज के सात बड़े सरोवरों में से एक कण्णमुण्ड दह (झील) के किनारे विमान-प्रेतनी होकर पैदा हुई। विमान के पास ही उसके कर्म-विपाक को भोगने योग्य एक पुष्करिणी (तालाब) पैदा हुई। बाकी पाँच सौ स्त्रियाँ भी मरकर शपथ-कर्म के कारण उसी की दासियाँ होकर पैदा हुईं। वह वहाँ पहले किए हुए पुण्य कर्म के फल से दिन के हिस्से में दिव्य सम्पत्ति को भोगती थीं और आधी रात में पाप कर्म के बल से प्रेरित होकर शयन (बिस्तर) से उठकर पुष्करिणी के किनारे जाती है। वहाँ जाने पर हाथी के बच्चे के बराबर एक काला कुत्ता - भयंकर रूप वाला, कटे हुए कानों वाला, तीखे-लंबे-कठोर दांतों वाला, खूब खिले हुए बबूल के अंगारों के ढेर जैसी आँखों वाला, लगातार चमकती बिजली की लताओं के समूह जैसी जीभ वाला, कठोर-तीखे नाखूनों वाला, खुरदरे-लंबे-बुरे रंग के रोम वाला - वहाँ से आकर उसे ज़मीन पर गिराकर अत्यंत भूख से पीड़ित की तरह बलपूर्वक खाते हुए केवल हड्डियों का ढाँचा मात्र करके दांतों से पकड़कर पुष्करिणी (तालाब) में फेंककर अंतर्धान हो जाता है। और वह वहाँ फेंके जाने के तुरंत बाद ही अपने सामान्य रूप को धारण करके विमान पर चढ़कर शयन पर लेट जाती थी। दूसरी स्त्रियाँ तो उसकी दासता (slavery) का ही दुख भोगती हैं। इस प्रकार वहाँ रहते हुए उनका पाँच सौ पचास वर्ष बीत गए।
फिर उन स्त्रियों को पुरुषों के बिना दिव्य सम्पत्ति भोगते हुए बेचैनी हुई। वहाँ कण्णमुण्ड झील से निकली हुई पर्वत की दरार से आकर गंगा नदी में प्रवेश करने वाली एक नदी थी। और उनके निवास स्थान के पास दिव्य फलों वाले आम के वृक्षों और कटहल-लाबू (jack and breadfruit trees) आदि से सुशोभित बगीचे जैसा एक जंगल का प्रदेश था। उन्होंने ऐसा सोचा - "अच्छा, हम इन आम फलों को इस नदी में डालें, शायद इस फल को देखकर फल के लोभ से कोई पुरुष यहाँ आ जाए, उसके साथ हम रमण करेंगे।" उन्होंने वैसा ही किया। उनके द्वारा फेंके गए आम फलों में से कुछ को तपस्वियों ने लिया, कुछ को वनचरों ने, कुछ को कौओं ने नोच लिया, कुछ किनारे पर लग गए। एक फल गंगा के स्रोत में पहुँचकर क्रमशः वाराणसी पहुँच गया।
उसने "मैं ऐसा नहीं जानती" कहकर इनकार किया, और पति के विश्वास न करने पर पास में खड़े कुत्ते को दिखाकर शपथ खाई - "यदि मैंने ऐसा पाप कर्म किया है, तो यह कटे हुए कान वाला कुत्ता जहाँ-जहाँ मैं जन्म लूँ, वहाँ-वहाँ मुझे खाए।"
दूसरी पाँच सौ स्त्रियाँ उस स्त्री को व्यभिचारिणी जानती हुई भी जब "क्या इसने वैसा पाप किया या नहीं किया" करके पूछी गईं, तो "हम ऐसा नहीं जानतीं" कहकर झूठ बोलकर "यदि हम जानती हों, तो भव-भव (भविष्य के जन्मों) में इसी की दासी हों" ऐसी शपथ खा ली।
फिर वह व्यभिचारिणी स्त्री उसी पश्चाताप से जलते हुए हृदय वाली होकर सूख कर थोड़े ही समय में मरकर हिमालय में पर्वतराज के सात बड़े सरोवरों में से एक कण्णमुण्ड दह (झील) के किनारे विमान-प्रेतनी होकर पैदा हुई। विमान के पास ही उसके कर्म-विपाक को भोगने योग्य एक पुष्करिणी (तालाब) पैदा हुई। बाकी पाँच सौ स्त्रियाँ भी मरकर शपथ-कर्म के कारण उसी की दासियाँ होकर पैदा हुईं। वह वहाँ पहले किए हुए पुण्य कर्म के फल से दिन के हिस्से में दिव्य सम्पत्ति को भोगती थीं और आधी रात में पाप कर्म के बल से प्रेरित होकर शयन (बिस्तर) से उठकर पुष्करिणी के किनारे जाती है। वहाँ जाने पर हाथी के बच्चे के बराबर एक काला कुत्ता - भयंकर रूप वाला, कटे हुए कानों वाला, तीखे-लंबे-कठोर दांतों वाला, खूब खिले हुए बबूल के अंगारों के ढेर जैसी आँखों वाला, लगातार चमकती बिजली की लताओं के समूह जैसी जीभ वाला, कठोर-तीखे नाखूनों वाला, खुरदरे-लंबे-बुरे रंग के रोम वाला - वहाँ से आकर उसे ज़मीन पर गिराकर अत्यंत भूख से पीड़ित की तरह बलपूर्वक खाते हुए केवल हड्डियों का ढाँचा मात्र करके दांतों से पकड़कर पुष्करिणी (तालाब) में फेंककर अंतर्धान हो जाता है। और वह वहाँ फेंके जाने के तुरंत बाद ही अपने सामान्य रूप को धारण करके विमान पर चढ़कर शयन पर लेट जाती थी। दूसरी स्त्रियाँ तो उसकी दासता (slavery) का ही दुख भोगती हैं। इस प्रकार वहाँ रहते हुए उनका पाँच सौ पचास वर्ष बीत गए।
फिर उन स्त्रियों को पुरुषों के बिना दिव्य सम्पत्ति भोगते हुए बेचैनी हुई। वहाँ कण्णमुण्ड झील से निकली हुई पर्वत की दरार से आकर गंगा नदी में प्रवेश करने वाली एक नदी थी। और उनके निवास स्थान के पास दिव्य फलों वाले आम के वृक्षों और कटहल-लाबू (jack and breadfruit trees) आदि से सुशोभित बगीचे जैसा एक जंगल का प्रदेश था। उन्होंने ऐसा सोचा - "अच्छा, हम इन आम फलों को इस नदी में डालें, शायद इस फल को देखकर फल के लोभ से कोई पुरुष यहाँ आ जाए, उसके साथ हम रमण करेंगे।" उन्होंने वैसा ही किया। उनके द्वारा फेंके गए आम फलों में से कुछ को तपस्वियों ने लिया, कुछ को वनचरों ने, कुछ को कौओं ने नोच लिया, कुछ किनारे पर लग गए। एक फल गंगा के स्रोत में पहुँचकर क्रमशः वाराणसी पहुँच गया।
उस समय वाराणसी का राजा लोहे के जाल से घिरे हुए गंगा जल में स्नान करता था। फिर वह फल नदी के स्रोत से बहता हुआ क्रमशः आकर लोहे के जाल में लग गया। उस वर्ण(=रंग), गंध, रस से सम्पन्न बड़े दिव्य आम फल को देखकर राजपुरुषों ने राजा के पास पहुँचाया। राजा ने उसका एक टुकड़ा लेकर परखने के लिए बंधनागार (जेलखाना) में रखे गए एक वध्य (=मारने डालने योग्य) चोर को खाने के लिए दिया। उसने उसे खाकर कहा - “देव, मैंने ऐसा पहले कभी नहीं खाया, यह दिव्य आम फल लगता है।” राजा ने फिर उसे एक और टुकड़ा दिया। वह उसे खाकर झुर्रियाँ और सफेद बालों से रहित होकर अत्यंत मनोहर रूप वाला, जैसे यौवन में स्थित हो गया हो, वैसा हो गया। उसे देखकर राजा आश्चर्य से भर गया और उस आम फल को खाकर शरीर में विशेषता पाकर मनुष्यों से पूछा -
“कहाँ ऐसे दिव्य आम फल मिलते हैं?”
मनुष्यों ने ऐसा कहा - “हिमालय पर्वतराज में, देव।”
(राजा-) “क्या उन्हें लाया जा सकता है?”
“वनचर जानते हैं, देव।”
राजा ने वनचरों को बुलाकर उन्हें वह बात बताकर उनसे मंत्रणा करके उनमें से एक दरिद्र वनचर को एक हजार देकर उसे भेजा - "जाओ, शीघ्र मेरे लिए वह आम फल लाओ।" वह उस हजार कहापण (स्वर्ण मुद्रा) को पुत्र-स्त्री को देकर पाथेय (रास्ते के लिए खाना) लेकर गंगा के किनारे-किनारे कण्णमुण्ड झील की ओर जाकर मनुष्यों के मार्ग को लांघकर कण्णमुण्ड झील से इधर साठ योजन प्रमाण (=माप) प्रदेश में एक तपस्वी को देखकर उसके बताए मार्ग से जाते हुए फिर तीस योजन प्रमाण (आगे) प्रदेश में एक तपस्वी को देखा, उसके बताए मार्ग से जाते हुए फिर पंद्रह योजन प्रमाण (आगे) स्थान में दूसरे तपस्वी को देखा, उसे अपने आने का कारण बताया। तपस्वी ने उसे उपदेश दिया - "यहाँ से इस महागंगा को छोड़कर इस छोटी नदी के सहारे प्रतिस्रोत (=धारा के विरुद्ध) जाते हुए जब पर्वत की दरार देखो, तब रात में मशाल लेकर प्रवेश करना। और यह नदी रात में नहीं बहती, इसलिए तुम्हारे लिए जाने योग्य होती है, कुछ योजन जाने पर तुम्हें आम मिलेंगे।" उसने वैसा किया और वह सूर्योदय होते ही विविध रत्नों की किरणों के जाल से प्रकाशित भूमि भाग वाला, फल के भार से झुकी शाखाओं के वितान वाले वृक्षों के समूह से शोभित, नाना प्रकार के पक्षियों के समूह से गूंजता हुआ अत्यंत मनोहर आम वन पहुँच गया।
फिर उन अमनुष्य स्त्रियों ने उसे दूर से ही आते देख "यह (पुरुष) मेरा है, यह (पुरुष) मेरा है" कहकर (उसके पास) दौड़कर गईं। पर उसने उनके साथ वहाँ दिव्य सम्पत्ति भोगने योग्य पुण्य कर्म न करने के कारण उन्हें देखते ही डरकर चिल्लाते हुए भागकर क्रमशः वाराणसी पहुँचकर वह बात राजा को बताई। राजा उसे सुनकर उन स्त्रियों को देखने और आम फलों को भोगने की इच्छा उत्पन्न होने से राज्य का भार मंत्रियों पर डालकर मृग-व्याध (=शिकार) के बहाने कवच-धनुष धारण कर तलवार बाँधकर कुछ मनुष्यों के परिवार के साथ उसी वनचर द्वारा दिखाए गए मार्ग से जाकर कुछ योजन के अंतर में मनुष्यों को भी रोककर केवल वनचर को लेकर क्रमशः जाकर उसे भी वहाँ से लौटाकर सूर्योदय होते ही आम वन में प्रवेश किया। फिर उन स्त्रियों ने उसे नए उत्पन्न देवपुत्र की तरह देखकर सामने आकर "राजा" है ऐसा जानकर प्रेम और बहुत आदर उत्पन्न होने से अच्छी तरह नहलाकर दिव्य वस्त्र-अलंकार-माला-गंध-विलेपन से अच्छी तरह सजाकर विमान पर चढ़ाकर नाना रसों वाला दिव्य भोजन खिलाकर उसकी इच्छा के अनुसार सेवा की।
फिर डेढ़ सौ वर्ष बीतने पर राजा आधी रात के समय उठकर बैठा हुआ उस व्यभिचारिणी प्रेतनी को पुष्करिणी के किनारे जाते देख "यह इस समय क्यों जाती है" यह जानने की इच्छा से उसके पीछे गया। फिर उसे वहाँ जाकर कुत्ते द्वारा खाई जाती देख "यह क्या है" ऐसा न जानते हुए तीन दिन तक देखकर "यह इसका शत्रु होगा" ऐसा सोचकर (कुत्ते को) तीखे बाण से बींधकर जीवन से वंचित कर (=मारकर) उस स्त्री को पुष्करिणी में उतारकर पहले का रूप पाया हुआ देखकर बारह गाथाओं से उससे उसकी बात पूछी -
“कहाँ ऐसे दिव्य आम फल मिलते हैं?”
मनुष्यों ने ऐसा कहा - “हिमालय पर्वतराज में, देव।”
(राजा-) “क्या उन्हें लाया जा सकता है?”
“वनचर जानते हैं, देव।”
राजा ने वनचरों को बुलाकर उन्हें वह बात बताकर उनसे मंत्रणा करके उनमें से एक दरिद्र वनचर को एक हजार देकर उसे भेजा - "जाओ, शीघ्र मेरे लिए वह आम फल लाओ।" वह उस हजार कहापण (स्वर्ण मुद्रा) को पुत्र-स्त्री को देकर पाथेय (रास्ते के लिए खाना) लेकर गंगा के किनारे-किनारे कण्णमुण्ड झील की ओर जाकर मनुष्यों के मार्ग को लांघकर कण्णमुण्ड झील से इधर साठ योजन प्रमाण (=माप) प्रदेश में एक तपस्वी को देखकर उसके बताए मार्ग से जाते हुए फिर तीस योजन प्रमाण (आगे) प्रदेश में एक तपस्वी को देखा, उसके बताए मार्ग से जाते हुए फिर पंद्रह योजन प्रमाण (आगे) स्थान में दूसरे तपस्वी को देखा, उसे अपने आने का कारण बताया। तपस्वी ने उसे उपदेश दिया - "यहाँ से इस महागंगा को छोड़कर इस छोटी नदी के सहारे प्रतिस्रोत (=धारा के विरुद्ध) जाते हुए जब पर्वत की दरार देखो, तब रात में मशाल लेकर प्रवेश करना। और यह नदी रात में नहीं बहती, इसलिए तुम्हारे लिए जाने योग्य होती है, कुछ योजन जाने पर तुम्हें आम मिलेंगे।" उसने वैसा किया और वह सूर्योदय होते ही विविध रत्नों की किरणों के जाल से प्रकाशित भूमि भाग वाला, फल के भार से झुकी शाखाओं के वितान वाले वृक्षों के समूह से शोभित, नाना प्रकार के पक्षियों के समूह से गूंजता हुआ अत्यंत मनोहर आम वन पहुँच गया।
फिर उन अमनुष्य स्त्रियों ने उसे दूर से ही आते देख "यह (पुरुष) मेरा है, यह (पुरुष) मेरा है" कहकर (उसके पास) दौड़कर गईं। पर उसने उनके साथ वहाँ दिव्य सम्पत्ति भोगने योग्य पुण्य कर्म न करने के कारण उन्हें देखते ही डरकर चिल्लाते हुए भागकर क्रमशः वाराणसी पहुँचकर वह बात राजा को बताई। राजा उसे सुनकर उन स्त्रियों को देखने और आम फलों को भोगने की इच्छा उत्पन्न होने से राज्य का भार मंत्रियों पर डालकर मृग-व्याध (=शिकार) के बहाने कवच-धनुष धारण कर तलवार बाँधकर कुछ मनुष्यों के परिवार के साथ उसी वनचर द्वारा दिखाए गए मार्ग से जाकर कुछ योजन के अंतर में मनुष्यों को भी रोककर केवल वनचर को लेकर क्रमशः जाकर उसे भी वहाँ से लौटाकर सूर्योदय होते ही आम वन में प्रवेश किया। फिर उन स्त्रियों ने उसे नए उत्पन्न देवपुत्र की तरह देखकर सामने आकर "राजा" है ऐसा जानकर प्रेम और बहुत आदर उत्पन्न होने से अच्छी तरह नहलाकर दिव्य वस्त्र-अलंकार-माला-गंध-विलेपन से अच्छी तरह सजाकर विमान पर चढ़ाकर नाना रसों वाला दिव्य भोजन खिलाकर उसकी इच्छा के अनुसार सेवा की।
फिर डेढ़ सौ वर्ष बीतने पर राजा आधी रात के समय उठकर बैठा हुआ उस व्यभिचारिणी प्रेतनी को पुष्करिणी के किनारे जाते देख "यह इस समय क्यों जाती है" यह जानने की इच्छा से उसके पीछे गया। फिर उसे वहाँ जाकर कुत्ते द्वारा खाई जाती देख "यह क्या है" ऐसा न जानते हुए तीन दिन तक देखकर "यह इसका शत्रु होगा" ऐसा सोचकर (कुत्ते को) तीखे बाण से बींधकर जीवन से वंचित कर (=मारकर) उस स्त्री को पुष्करिणी में उतारकर पहले का रूप पाया हुआ देखकर बारह गाथाओं से उससे उसकी बात पूछी -
“सोण्णसोपानफलका ,
सोण्णवालुकसन्थता।
तत्थ सोगन्धिया वग्गू,
सुचिगन्धा मनोरमा॥
"सीढ़ियों के तख्ते सोने के हैं, सोने की बालू (=sand) बिछी है। वहाँ सुगंधित जल में कमल के फूल सुन्दर हैं, पवित्र गंध वाले, मनोहर।
"नानारुक्खेहि सञ्छन्ना,
नानागन्धसमेरिता।
नानापदुमसञ्छन्ना,
पुण्डरीकसमोतता॥
"नाना वृक्षों से ढकी हुई, नाना गंधों से युक्त, नाना कमलों से ढकी हुई, पुण्डरीक [श्वेत कमल] से ओत-प्रोत।
“सुरभिं सम्पवायन्ति,
मनुञ्ञा मालुतेरिता।
हंसकोञ्चाभिरुदा च,
चक्कवक्काभिकूजिता॥
"सुगंध बहाती हैं, मनोज्ञ वायु से प्रेरित। हंस और क्रौंच पक्षियों से निनादित, चकवा-चकवी (ruddy goose) से गूंजती हुई।
“नानादिजगणाकिण्णा,
नानासरगणायुता।
नानाफलधरा रुक्खा,
नानापुप्फधरा वना॥
"नाना (=अनेक प्रकार के) पक्षियों के गणों से भरी, नाना सारसों के गणों से युक्त। नाना फल धारण करने वाले वृक्ष, नाना फूल धारण करने वाले वन।
“न मनुस्सेसु ईदिसं,
नगरं यादिसं इदं।
पासादा बहुका तुय्हं,
सोवण्णरूपियामया।
दद्दल्लमाना आभेन्ति,
समन्ता चतुरो दिसा॥
"मनुष्यों में ऐसा नगर नहीं है, जैसा यह है। तेरे बहुत से प्रासाद (=महल) हैं, सोने-चाँदी से बने, (वे) चारों दिशाओं में चारों ओर चमकते हुए आभासित होते हैं,
“पञ्च दासिसता तुय्हं,
या तेमा परिचारिका।
ता कम्बुकायूरधरा,
कञ्चनावेळभूसिता॥
"पाँच सौ दासियाँ तेरी हैं, जो तेरी सेविकाएँ हैं। वे शंख के बाजूबंद धारण करने वाली, सोने की माला से सजी हुई हैं।
“पल्लङ्का बहुका तुय्हं,
सोवण्णरूपियामया।
कदलिमिगसञ्छन्ना,
सज्जा गोनकसन्थता॥
"बहुत से पलंग तेरे हैं, सोने-चाँदी से बने। कदली-मृग [के चर्म] से ढके, लम्बे बालों वाले बिछौने से ढका हुआ।
“यत्थ तुवं वासूपगता,
सब्बकामसमिद्धिनी।
सम्पत्तायड्ढरत्ताय,
ततो उट्ठाय गच्छसि॥
"जहाँ तुम निवास के लिए जाती हो वहाँ तुम सब कामनाओं से समृद्ध होती हो, लेकिन आधी रात आने पर, वहाँ से उठकर जाती हो।
“उय्यानभूमिं गन्त्वान,
पोक्खरञ्ञा समन्ततो।
तस्सा तीरे तुवं ठासि,
हरिते सद्दले सुभे॥
"उद्यान भूमि में जाकर तुम हरे-भरे कोमल शुद्ध घास के किनारे पर खड़ी होती हो जो पुष्करिणी (=तालाब) को चारों ओर से घेरता है।
“ततो ते कण्णमुण्डो सुनखो,
अङ्गमङ्गानि खादति।
यदा च खायिता आसि,
अट्ठिसङ्खलिका कता।
ओगाहसि पोक्खरणिं,
होति कायो यथा पुरे॥
"फिर तेरा कण्णमुण्ड (कटे हुए कानों वाला) कुत्ता, अंग-अंग को खाता है। जब खा लिया जाता है, अस्थि-कंकाल मात्र कर दिया जाता है और फिर तुम पुष्करिणी में प्रवेश करती हो, शरीर जैसा पहले था वैसा हो जाता है।
“ततो त्वं अङ्गपच्चङ्गी,
सुचारु पियदस्सना।
वत्थेन पारुपित्वान,
आयासि मम सन्तिकं॥
"फिर तुम अंग-प्रत्यंग वाली, सुन्दर, प्रियदर्शना (=देखने में प्रिय) होकर वस्त्र ओढ़कर, मेरे पास आती हो।
“किं नु कायेन वाचाय,
मनसा दुक्कटं कतं।
किस्सकम्मविपाकेन,
कण्णमुण्डो सुनखो तव।
अङ्गमङ्गानि खादती”ति॥
"तुमने शरीर, वाणी या मन द्वारा कौनसा गलत काम किया था? किस कर्म के फलस्वरूप, कण्णमुण्ड (कटे हुए कानों वाला) कुत्ता तेरा, अंग-अंग को खाता है?”
सोण्णवालुकसन्थता।
तत्थ सोगन्धिया वग्गू,
सुचिगन्धा मनोरमा॥
"सीढ़ियों के तख्ते सोने के हैं, सोने की बालू (=sand) बिछी है। वहाँ सुगंधित जल में कमल के फूल सुन्दर हैं, पवित्र गंध वाले, मनोहर।
"नानारुक्खेहि सञ्छन्ना,
नानागन्धसमेरिता।
नानापदुमसञ्छन्ना,
पुण्डरीकसमोतता॥
"नाना वृक्षों से ढकी हुई, नाना गंधों से युक्त, नाना कमलों से ढकी हुई, पुण्डरीक [श्वेत कमल] से ओत-प्रोत।
“सुरभिं सम्पवायन्ति,
मनुञ्ञा मालुतेरिता।
हंसकोञ्चाभिरुदा च,
चक्कवक्काभिकूजिता॥
"सुगंध बहाती हैं, मनोज्ञ वायु से प्रेरित। हंस और क्रौंच पक्षियों से निनादित, चकवा-चकवी (ruddy goose) से गूंजती हुई।
“नानादिजगणाकिण्णा,
नानासरगणायुता।
नानाफलधरा रुक्खा,
नानापुप्फधरा वना॥
"नाना (=अनेक प्रकार के) पक्षियों के गणों से भरी, नाना सारसों के गणों से युक्त। नाना फल धारण करने वाले वृक्ष, नाना फूल धारण करने वाले वन।
“न मनुस्सेसु ईदिसं,
नगरं यादिसं इदं।
पासादा बहुका तुय्हं,
सोवण्णरूपियामया।
दद्दल्लमाना आभेन्ति,
समन्ता चतुरो दिसा॥
"मनुष्यों में ऐसा नगर नहीं है, जैसा यह है। तेरे बहुत से प्रासाद (=महल) हैं, सोने-चाँदी से बने, (वे) चारों दिशाओं में चारों ओर चमकते हुए आभासित होते हैं,
“पञ्च दासिसता तुय्हं,
या तेमा परिचारिका।
ता कम्बुकायूरधरा,
कञ्चनावेळभूसिता॥
"पाँच सौ दासियाँ तेरी हैं, जो तेरी सेविकाएँ हैं। वे शंख के बाजूबंद धारण करने वाली, सोने की माला से सजी हुई हैं।
“पल्लङ्का बहुका तुय्हं,
सोवण्णरूपियामया।
कदलिमिगसञ्छन्ना,
सज्जा गोनकसन्थता॥
"बहुत से पलंग तेरे हैं, सोने-चाँदी से बने। कदली-मृग [के चर्म] से ढके, लम्बे बालों वाले बिछौने से ढका हुआ।
“यत्थ तुवं वासूपगता,
सब्बकामसमिद्धिनी।
सम्पत्तायड्ढरत्ताय,
ततो उट्ठाय गच्छसि॥
"जहाँ तुम निवास के लिए जाती हो वहाँ तुम सब कामनाओं से समृद्ध होती हो, लेकिन आधी रात आने पर, वहाँ से उठकर जाती हो।
“उय्यानभूमिं गन्त्वान,
पोक्खरञ्ञा समन्ततो।
तस्सा तीरे तुवं ठासि,
हरिते सद्दले सुभे॥
"उद्यान भूमि में जाकर तुम हरे-भरे कोमल शुद्ध घास के किनारे पर खड़ी होती हो जो पुष्करिणी (=तालाब) को चारों ओर से घेरता है।
“ततो ते कण्णमुण्डो सुनखो,
अङ्गमङ्गानि खादति।
यदा च खायिता आसि,
अट्ठिसङ्खलिका कता।
ओगाहसि पोक्खरणिं,
होति कायो यथा पुरे॥
"फिर तेरा कण्णमुण्ड (कटे हुए कानों वाला) कुत्ता, अंग-अंग को खाता है। जब खा लिया जाता है, अस्थि-कंकाल मात्र कर दिया जाता है और फिर तुम पुष्करिणी में प्रवेश करती हो, शरीर जैसा पहले था वैसा हो जाता है।
“ततो त्वं अङ्गपच्चङ्गी,
सुचारु पियदस्सना।
वत्थेन पारुपित्वान,
आयासि मम सन्तिकं॥
"फिर तुम अंग-प्रत्यंग वाली, सुन्दर, प्रियदर्शना (=देखने में प्रिय) होकर वस्त्र ओढ़कर, मेरे पास आती हो।
“किं नु कायेन वाचाय,
मनसा दुक्कटं कतं।
किस्सकम्मविपाकेन,
कण्णमुण्डो सुनखो तव।
अङ्गमङ्गानि खादती”ति॥
"तुमने शरीर, वाणी या मन द्वारा कौनसा गलत काम किया था? किस कर्म के फलस्वरूप, कण्णमुण्ड (कटे हुए कानों वाला) कुत्ता तेरा, अंग-अंग को खाता है?”
इस प्रकार उस राजा द्वारा पूछने पर उस प्रेतनी ने शुरू से अपने बारे में उसे बताते हुए पाँच गाथाएँ कहीं -
“किमिलायं गहपति,
सद्धो आसि उपासको।
तस्साहं भरिया आसिं,
दुस्सीला अतिचारिनी॥
"किमिला में एक गृहपति, श्रद्धावान उपासक था।
मैं उसकी भार्या थी, दुःशीला, व्यभिचारिणी।
“सो मं अतिचरमानाय,
सामिको एतदब्रवि।
‘नेतं तं छन्नं पतिरूपं,
यं त्वं अतिचरासि मं’॥
"मेरे स्वामी ने मुझे व्यभिचार करती हुई को यह कहा - 'यह उचित नहीं है, ठीक नहीं है, जो तू मेरा अतिचार (=व्यभिचार) करती है।'
“साहं घोरञ्च सपथं,
मुसावादञ्च भासिसं।
‘नाहं तं अतिचरामि,
कायेन उद चेतसा॥
"मैंने घोर शपथ ली, और झूठ बोला - 'मैं आपका अतिचार (व्यभिचार) नहीं करती, काय (=शरीर) से या मन से।
“‘सचाहं तं अतिचरामि,
कायेन उद चेतसा।
कण्णमुण्डोयं सुनखो,
अङ्गमङ्गानि खादतु’॥
"यदि मैं आपका अतिचार करती हूँ, शरीर से या मन से, तो यह कण्णमुण्ड (कटे हुए कानों वाला) कुत्ता, मेरे अंग-अंग को खाए।'
“तस्स कम्मस्स विपाकं,
मुसावादस्स चूभयं।
सत्तेव वस्ससतानि,
अनुभूतं यतो हि मे।
कण्णमुण्डो च सुनखो,
अङ्गमङ्गानि खादती”ति॥
"उस कर्म के फलस्वरूप, और झूठ बोलने का भी, दोनों का (फल), तब से सात सौ वर्ष से मैंने भोगा है। कण्णमुण्ड (कटे हुए कानों वाला) कुत्ता, अंग-अंग को खाता है।"
और इस प्रकार कहकर उसके द्वारा किए गए उपकार की प्रशंसा करती हुई दो गाथाएँ कहीं -
“त्वञ्च देव बहुकारो,
अत्थाय मे इधागतो।
सुमुत्ताहं कण्णमुण्डस्स,
असोका अकुतोभया॥
"देव, और आप मेरे बहुत उपकारक हैं, मेरे हित (=भले) के लिए यहाँ आए हैं। मैं कण्णमुण्ड से अच्छी तरह मुक्त हो गई हूँ, शोक रहित हूँ, हर तरफ से निर्भय हूँ।
“ताहं देव नमस्सामि,
याचामि पञ्जलीकता।
भुञ्ज अमानुसे कामे,
रम देव मया सहा”ति॥
"देव, इसलिए मैं आपको नमस्कार करती हूँ,
अंजलि जोड़कर याचना करती हूँ। मानुषेतर कामों को भोगिए, देव, मेरे साथ रमण कीजिए।"
फिर राजा ने वहाँ निवास करने से उदासीनता वाले मन वाला होकर जाने के इरादे को प्रकट किया। उसे सुनकर प्रेतनी राजा में आसक्त चित्त वाली (होने के कारण) वहाँ ही उसके निवास की याचना करती हुई "ताहं देव नमस्सामि" गाथा बोली। फिर राजा निश्चित रूप से नगर को जाने की इच्छा वाला होकर अपने इरादे को प्रकट करते हुए अंतिम गाथा बोला -
“भुत्ता अमानुसा कामा,
रमितोम्हि तया सह।
ताहं सुभगे याचामि,
खिप्पं पटिनयाहि म”न्ति॥
"अमानुष काम भोग लिए गए, तुम्हारे साथ मैंने रमण किया। सौभाग्य-वान, इसलिए, मैं तुमसे याचना करता हूँ, शीघ्र मुझे [मेरे नगर को] लौटा दे।"
फिर वह विमान-प्रेती राजा का वचन सुनकर वियोग को न सह सकने के कारण शोक से आतुर होकर व्याकुल हृदय वाली, कांपते शरीर वाली, नाना प्रकार के उपायों से याचना करके भी उसे वहाँ रखने में असमर्थ होकर बहुत से बहुमूल्य रत्नों के साथ राजा को नगर ले जाकर प्रासाद पर चढ़ाकर, रोकर, विलाप करके अपने निवास स्थान को ही गई। राजा तो उसे देखकर संवेग उत्पन्न होने से दान आदि पुण्य कर्म करके स्वर्ग में जाने वाला हुआ। फिर हमारे भगवान के लोक में उत्पन्न होकर श्रेष्ठ धर्मचक्र प्रवर्तित करने पर क्रमशः श्रावस्ती में विहार करते समय एक दिन आयुष्मान महामोग्गल्लान ने पर्वत-चारिका करते हुए उस स्त्री को परिवार सहित देखकर उससे किए गए कर्म के बारे में पूछा। उसने शुरू से सब स्थविर को बताया। स्थविर ने उन्हें धर्म का उपदेश दिया। वह बात स्थविर ने भगवान को बताई। भगवान ने उस बात को अट्ठुप्पत्ति (अर्थ+उत्पत्ति = कारण की उत्पत्ति) करके वहाँ इकट्ठे हुए लोगों के समूह के लिए धर्म-उपदेश किया। बहुत से लोग संवेग प्राप्त करके पाप से हटकर दान आदि पुण्य कर्म करके स्वर्गपरायण हुए।
🌸 पेतवत्थु २.१२, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
“किमिलायं गहपति,
सद्धो आसि उपासको।
तस्साहं भरिया आसिं,
दुस्सीला अतिचारिनी॥
"किमिला में एक गृहपति, श्रद्धावान उपासक था।
मैं उसकी भार्या थी, दुःशीला, व्यभिचारिणी।
“सो मं अतिचरमानाय,
सामिको एतदब्रवि।
‘नेतं तं छन्नं पतिरूपं,
यं त्वं अतिचरासि मं’॥
"मेरे स्वामी ने मुझे व्यभिचार करती हुई को यह कहा - 'यह उचित नहीं है, ठीक नहीं है, जो तू मेरा अतिचार (=व्यभिचार) करती है।'
“साहं घोरञ्च सपथं,
मुसावादञ्च भासिसं।
‘नाहं तं अतिचरामि,
कायेन उद चेतसा॥
"मैंने घोर शपथ ली, और झूठ बोला - 'मैं आपका अतिचार (व्यभिचार) नहीं करती, काय (=शरीर) से या मन से।
“‘सचाहं तं अतिचरामि,
कायेन उद चेतसा।
कण्णमुण्डोयं सुनखो,
अङ्गमङ्गानि खादतु’॥
"यदि मैं आपका अतिचार करती हूँ, शरीर से या मन से, तो यह कण्णमुण्ड (कटे हुए कानों वाला) कुत्ता, मेरे अंग-अंग को खाए।'
“तस्स कम्मस्स विपाकं,
मुसावादस्स चूभयं।
सत्तेव वस्ससतानि,
अनुभूतं यतो हि मे।
कण्णमुण्डो च सुनखो,
अङ्गमङ्गानि खादती”ति॥
"उस कर्म के फलस्वरूप, और झूठ बोलने का भी, दोनों का (फल), तब से सात सौ वर्ष से मैंने भोगा है। कण्णमुण्ड (कटे हुए कानों वाला) कुत्ता, अंग-अंग को खाता है।"
और इस प्रकार कहकर उसके द्वारा किए गए उपकार की प्रशंसा करती हुई दो गाथाएँ कहीं -
“त्वञ्च देव बहुकारो,
अत्थाय मे इधागतो।
सुमुत्ताहं कण्णमुण्डस्स,
असोका अकुतोभया॥
"देव, और आप मेरे बहुत उपकारक हैं, मेरे हित (=भले) के लिए यहाँ आए हैं। मैं कण्णमुण्ड से अच्छी तरह मुक्त हो गई हूँ, शोक रहित हूँ, हर तरफ से निर्भय हूँ।
“ताहं देव नमस्सामि,
याचामि पञ्जलीकता।
भुञ्ज अमानुसे कामे,
रम देव मया सहा”ति॥
"देव, इसलिए मैं आपको नमस्कार करती हूँ,
अंजलि जोड़कर याचना करती हूँ। मानुषेतर कामों को भोगिए, देव, मेरे साथ रमण कीजिए।"
फिर राजा ने वहाँ निवास करने से उदासीनता वाले मन वाला होकर जाने के इरादे को प्रकट किया। उसे सुनकर प्रेतनी राजा में आसक्त चित्त वाली (होने के कारण) वहाँ ही उसके निवास की याचना करती हुई "ताहं देव नमस्सामि" गाथा बोली। फिर राजा निश्चित रूप से नगर को जाने की इच्छा वाला होकर अपने इरादे को प्रकट करते हुए अंतिम गाथा बोला -
“भुत्ता अमानुसा कामा,
रमितोम्हि तया सह।
ताहं सुभगे याचामि,
खिप्पं पटिनयाहि म”न्ति॥
"अमानुष काम भोग लिए गए, तुम्हारे साथ मैंने रमण किया। सौभाग्य-वान, इसलिए, मैं तुमसे याचना करता हूँ, शीघ्र मुझे [मेरे नगर को] लौटा दे।"
फिर वह विमान-प्रेती राजा का वचन सुनकर वियोग को न सह सकने के कारण शोक से आतुर होकर व्याकुल हृदय वाली, कांपते शरीर वाली, नाना प्रकार के उपायों से याचना करके भी उसे वहाँ रखने में असमर्थ होकर बहुत से बहुमूल्य रत्नों के साथ राजा को नगर ले जाकर प्रासाद पर चढ़ाकर, रोकर, विलाप करके अपने निवास स्थान को ही गई। राजा तो उसे देखकर संवेग उत्पन्न होने से दान आदि पुण्य कर्म करके स्वर्ग में जाने वाला हुआ। फिर हमारे भगवान के लोक में उत्पन्न होकर श्रेष्ठ धर्मचक्र प्रवर्तित करने पर क्रमशः श्रावस्ती में विहार करते समय एक दिन आयुष्मान महामोग्गल्लान ने पर्वत-चारिका करते हुए उस स्त्री को परिवार सहित देखकर उससे किए गए कर्म के बारे में पूछा। उसने शुरू से सब स्थविर को बताया। स्थविर ने उन्हें धर्म का उपदेश दिया। वह बात स्थविर ने भगवान को बताई। भगवान ने उस बात को अट्ठुप्पत्ति (अर्थ+उत्पत्ति = कारण की उत्पत्ति) करके वहाँ इकट्ठे हुए लोगों के समूह के लिए धर्म-उपदेश किया। बहुत से लोग संवेग प्राप्त करके पाप से हटकर दान आदि पुण्य कर्म करके स्वर्गपरायण हुए।
🌸 पेतवत्थु २.१२, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
🌺सुत्तपेतवत्थु🌺 #petavatthu
'अहं पुरे पब्बजितस्स भिक्खुनो...' - यह सुत्त पेतवत्थु (सूत्र प्रेत की कथा) है।
इस (कथा) की उत्पत्ति कैसे हुई? कहा जाता है कि हमारे शास्ता के उत्पन्न होने से सात सौ साल पहले, श्रावस्ती के पास एक गाँव में एक लड़का एक पच्चेकबुद्ध की सेवा करता था। जब वह बड़ा हुआ तो उसकी माता उसके लिए उसी के बराबर के कुल से एक लड़की लेकर आई। शादी के दिन ही वह कुमार दोस्तों के साथ नहाने गया और सांप के काटने से मर गया, कहते हैं कि यक्ष के वश (में आने) से मर गया। वह पच्चेकबुद्ध की सेवा से बहुत पुण्य करके भी उस लड़की के प्रति आसक्ति के कारण विमान-प्रेत होकर पैदा हुआ, पर वह बड़ी ऋद्धि वाला और बड़े प्रभाव वाला (महानुभाव) था।
'अहं पुरे पब्बजितस्स भिक्खुनो...' - यह सुत्त पेतवत्थु (सूत्र प्रेत की कथा) है।
इस (कथा) की उत्पत्ति कैसे हुई? कहा जाता है कि हमारे शास्ता के उत्पन्न होने से सात सौ साल पहले, श्रावस्ती के पास एक गाँव में एक लड़का एक पच्चेकबुद्ध की सेवा करता था। जब वह बड़ा हुआ तो उसकी माता उसके लिए उसी के बराबर के कुल से एक लड़की लेकर आई। शादी के दिन ही वह कुमार दोस्तों के साथ नहाने गया और सांप के काटने से मर गया, कहते हैं कि यक्ष के वश (में आने) से मर गया। वह पच्चेकबुद्ध की सेवा से बहुत पुण्य करके भी उस लड़की के प्रति आसक्ति के कारण विमान-प्रेत होकर पैदा हुआ, पर वह बड़ी ऋद्धि वाला और बड़े प्रभाव वाला (महानुभाव) था।
फिर उसने उस लड़की को अपने विमान में ले जाने की इच्छा से सोचा - "किस उपाय से यह इसी जन्म में फल देने वाला कर्म करके मेरे साथ यहाँ आनंद कर सके?" उसके दिव्य भोग-सम्पत्ति के अनुभव का कारण ढूंढते हुए उसने एक पच्चेकबुद्ध को चीवर सीते हुए देखा, तो मनुष्य के रूप में जाकर वंदना करके बोला - "भंते, क्या आपको धागे की जरूरत है?"
"मैं चीवर का काम कर रहा हूँ, उपासक।"
"तो भंते, अमुक जगह पर धागे की भिक्षा के लिए जाइए" - ऐसा कहकर उस लड़की का घर दिखा दिया। पच्चेकबुद्ध वहाँ जाकर घर के दरवाजे पर खड़े हो गए।
तब उस लड़की ने पच्चेकबुद्ध को वहाँ खड़ा देखकर प्रसन्न मन से "आर्य को धागे की जरूरत है" ऐसा जानकर एक धागे का गोला दे दिया। फिर वह अमनुष्य मनुष्य के रूप में उस लड़की के घर जाकर उसकी माता से मांगकर उसके साथ कुछ दिन रहा, और उसकी माता की सहायता करने के लिए उस घर के सारे बर्तनों को सोने-चांदी से भरकर सब पर नाम लिख दिया - "यह देवताओं के द्वारा दिया गया धन है, इसे कोई न ले।" और उस लड़की को लेकर अपने विमान में चला गया। उसकी माता बहुत सा धन पाकर अपने रिश्तेदारों और गरीबों, यात्रियों आदि को देकर और खुद भी भोगकर मरते समय रिश्तेदारों से कह गई - "मेरी बेटी आए तो यह धन उसे दे देना" और मर गई।
फिर सात सौ साल बीतने पर हमारे भगवान के लोक में उत्पन्न होकर उत्तम धर्मचक्र प्रवर्तित करके क्रमशः श्रावस्ती में विहरते समय, उस अमनुष्य के साथ रह रही उस स्त्री को असंतुष्टि (बेचैनी) पैदा हुई। उसने उससे "अच्छा, आर्यपुत्र, मुझे मेरे ही घर वापस ले चलो" कहते हुए ये गाथाएं कही -
"मैं चीवर का काम कर रहा हूँ, उपासक।"
"तो भंते, अमुक जगह पर धागे की भिक्षा के लिए जाइए" - ऐसा कहकर उस लड़की का घर दिखा दिया। पच्चेकबुद्ध वहाँ जाकर घर के दरवाजे पर खड़े हो गए।
तब उस लड़की ने पच्चेकबुद्ध को वहाँ खड़ा देखकर प्रसन्न मन से "आर्य को धागे की जरूरत है" ऐसा जानकर एक धागे का गोला दे दिया। फिर वह अमनुष्य मनुष्य के रूप में उस लड़की के घर जाकर उसकी माता से मांगकर उसके साथ कुछ दिन रहा, और उसकी माता की सहायता करने के लिए उस घर के सारे बर्तनों को सोने-चांदी से भरकर सब पर नाम लिख दिया - "यह देवताओं के द्वारा दिया गया धन है, इसे कोई न ले।" और उस लड़की को लेकर अपने विमान में चला गया। उसकी माता बहुत सा धन पाकर अपने रिश्तेदारों और गरीबों, यात्रियों आदि को देकर और खुद भी भोगकर मरते समय रिश्तेदारों से कह गई - "मेरी बेटी आए तो यह धन उसे दे देना" और मर गई।
फिर सात सौ साल बीतने पर हमारे भगवान के लोक में उत्पन्न होकर उत्तम धर्मचक्र प्रवर्तित करके क्रमशः श्रावस्ती में विहरते समय, उस अमनुष्य के साथ रह रही उस स्त्री को असंतुष्टि (बेचैनी) पैदा हुई। उसने उससे "अच्छा, आर्यपुत्र, मुझे मेरे ही घर वापस ले चलो" कहते हुए ये गाथाएं कही -
“अहं पुरे पब्बजितस्स भिक्खुनो,
सुत्तं अदासिं उपसङ्कम्म याचिता।
तस्स विपाको विपुलफलूपलब्भति,
बहुका च मे उप्पज्जरे वत्थकोटियो॥
"पूर्व में जब एक प्रव्रजित भिक्षु (पच्चेक बुद्ध) ने पास आकर (धागा) माँगा था, तब मैंने उनको धागा दिया था। उसी के फलस्वरूप बहुत बड़ा फल मिला है, मुझे अनेक कोटि कपड़े मिले हैं।
“पुप्फाभिकिण्णं रमितं विमानं,
अनेकचित्तं नरनारिसेवितं।
साहं भुञ्जामि च पारुपामि च,
पहूतवित्ता न च ताव खीयति॥
"फूलों से बिखरा हुआ रमणीय विमान है, इसमें अनेक चित्र हैं, नर-नारियों द्वारा सेवित है। मैं यहाँ भोगती हूँ और पहनती हूँ, बहुत धन है और वह खत्म भी नहीं होता।
“तस्सेव कम्मस्स विपाकमन्वया,
सुखञ्च सातञ्च इधूपलब्भति।
साहं गन्त्वा पुनदेव मानुसं,
काहामि पुञ्ञानि नयय्यपुत्त म”न्ति॥
"उसी कर्म के फल से ही, यहाँ सुख और आनंद मिल रहा है। पर मैं फिर से मनुष्य लोक में जाकर, पुण्य करूँगी। आर्यपुत्र, मुझे (यहां से मनुष्य लोक) ले चलें।
यह सुनकर उस अमनुष्य ने उसके प्रति अनुकम्पा के कारण और आसक्त चित्त होने के कारण जाने की अनिच्छा से यह गाथा कही –
“सत्त तुवं वस्ससता इधागता,
जिण्णा च वुड्ढा च तहिं भविस्ससि।
सब्बेव ते कालकता च ञातका,
किं तत्थ गन्त्वान इतो करिस्ससी”ति॥
"तुम्हें यहाँ आये हुए सात सौ साल हो गए हैं, तुम वहाँ बूढ़ी और वृद्ध हो जाओगी। तुम्हारे सभी रिश्तेदार मर चुके होंगे, तुम यहॉं से वहाँ जाकर क्या करोगी?"
उसके द्वारा ऐसा कहने पर उस लड़की ने उसके ऊपर विश्वास न करते हुए गाथा कही–
“सत्तेव वस्सानि इधागताय मे,
दिब्बञ्च सुखञ्च समप्पिताय।
साहं गन्त्वा पुनदेव मानुसं,
काहामि पुञ्ञानि नयय्यपुत्त म”न्ति॥
"दिव्य सुख से समर्पित हुए मुझे सात वर्ष ही हुए हैं। पर मैं फिर से मनुष्य लोक में जाकर पुण्य करूँगी। आर्यपुत्र, मुझे (यहां से मनुष्य लोक) ले चलें।"
ऐसा कहने पर उस विमान-पेत ने उसे अनेक प्रकार से समझाया और कहा - "तुम अब सात दिन से ज्यादा वहाँ जीवित नहीं रहोगी। तुम्हारी माता के पास मेरे दिए हुए धन का जो हिस्सा रखा है, वह है। उसे समण-ब्राह्मणों को देकर यहीं उत्पन्न होने की प्रार्थना करना।" ऐसा कहकर उसे बाँह से पकड़कर गाँव के बीच में छोड़कर बोला - "यहाँ आने वाले दूसरे लोगों को भी 'जितना हो सके पुण्य करो' ऐसा उपदेश देना" और चला गया। इसी के बारे में कहा गया है -
“सो तं गहेत्वान पसय्ह बाहायं,
पच्चानयित्वान थेरिं सुदुब्बलं।
वज्जेसि ‘अञ्ञम्पि जनं इधागतं,
करोथ पुञ्ञानि सुखूपलब्भती’”ति॥
"वह (अमनुष्य) उस बहुत दुर्बल, बूढ़ी को ज़ोर से बाँह से पकड़कर वापस ले गया और कहा - "यहाँ आए हुए दूसरे लोगों से भी कहो कि पुण्य करो, सुख मिलेगा।"
ऐसा कहकर उसके चले जाने पर वह स्त्री अपने रिश्तेदारों के रहने की जगह पर गई, उन्हें अपना परिचय दिया, उनसे दिया हुआ धन लेकर समण-ब्राह्मणों को दान देने लगी, और अपने पास आने-जाने वालों को इस गाथा द्वारा उपदेश देने लगी–
“दिट्ठा मया अकतेन साधुना,
पेता विहञ्ञन्ति तथेव मनुस्सा।
कम्मञ्च कत्वा सुखवेदनीयं,
देवा मनुस्सा च सुखे ठिता पजा”ति॥
"मेरे द्वारा देखा गया है कि पुण्य न करने वाले बुरे लोग, प्रेत होकर और मनुष्य होकर भी दुख पाते हैं। और सुख देने वाले कर्म करके, देवता और मनुष्य के रूप में प्रजा सुख में स्थित रहती है।"
इस प्रकार उपदेश देते हुए उसने समण-ब्राह्मणों आदि के लिए सात दिन तक महादान चलाया और सातवें दिन मरकर तावतिंस देवलोक में उत्पन्न हुई। भिक्षुओं ने यह घटना भगवान को बताई। भगवान ने उस बात को अट्ठुप्पत्ति (अर्थ+उत्पत्ति = कारण की उत्पत्ति) करके वहाँ इकट्ठे हुए लोगों के समूह के लिए धर्म-उपदेश किया और विशेष रूप से पच्चेकबुद्धों को दिए गए दान का बड़ा फल और बड़ा शुभ परिणाम बताया। उसे सुनकर बहुत से लोग कंजूसी के मैल से मुक्त होकर दान आदि पुण्यों में लग गए।
🌸पेतवत्थु २.११, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
सुत्तं अदासिं उपसङ्कम्म याचिता।
तस्स विपाको विपुलफलूपलब्भति,
बहुका च मे उप्पज्जरे वत्थकोटियो॥
"पूर्व में जब एक प्रव्रजित भिक्षु (पच्चेक बुद्ध) ने पास आकर (धागा) माँगा था, तब मैंने उनको धागा दिया था। उसी के फलस्वरूप बहुत बड़ा फल मिला है, मुझे अनेक कोटि कपड़े मिले हैं।
“पुप्फाभिकिण्णं रमितं विमानं,
अनेकचित्तं नरनारिसेवितं।
साहं भुञ्जामि च पारुपामि च,
पहूतवित्ता न च ताव खीयति॥
"फूलों से बिखरा हुआ रमणीय विमान है, इसमें अनेक चित्र हैं, नर-नारियों द्वारा सेवित है। मैं यहाँ भोगती हूँ और पहनती हूँ, बहुत धन है और वह खत्म भी नहीं होता।
“तस्सेव कम्मस्स विपाकमन्वया,
सुखञ्च सातञ्च इधूपलब्भति।
साहं गन्त्वा पुनदेव मानुसं,
काहामि पुञ्ञानि नयय्यपुत्त म”न्ति॥
"उसी कर्म के फल से ही, यहाँ सुख और आनंद मिल रहा है। पर मैं फिर से मनुष्य लोक में जाकर, पुण्य करूँगी। आर्यपुत्र, मुझे (यहां से मनुष्य लोक) ले चलें।
यह सुनकर उस अमनुष्य ने उसके प्रति अनुकम्पा के कारण और आसक्त चित्त होने के कारण जाने की अनिच्छा से यह गाथा कही –
“सत्त तुवं वस्ससता इधागता,
जिण्णा च वुड्ढा च तहिं भविस्ससि।
सब्बेव ते कालकता च ञातका,
किं तत्थ गन्त्वान इतो करिस्ससी”ति॥
"तुम्हें यहाँ आये हुए सात सौ साल हो गए हैं, तुम वहाँ बूढ़ी और वृद्ध हो जाओगी। तुम्हारे सभी रिश्तेदार मर चुके होंगे, तुम यहॉं से वहाँ जाकर क्या करोगी?"
उसके द्वारा ऐसा कहने पर उस लड़की ने उसके ऊपर विश्वास न करते हुए गाथा कही–
“सत्तेव वस्सानि इधागताय मे,
दिब्बञ्च सुखञ्च समप्पिताय।
साहं गन्त्वा पुनदेव मानुसं,
काहामि पुञ्ञानि नयय्यपुत्त म”न्ति॥
"दिव्य सुख से समर्पित हुए मुझे सात वर्ष ही हुए हैं। पर मैं फिर से मनुष्य लोक में जाकर पुण्य करूँगी। आर्यपुत्र, मुझे (यहां से मनुष्य लोक) ले चलें।"
ऐसा कहने पर उस विमान-पेत ने उसे अनेक प्रकार से समझाया और कहा - "तुम अब सात दिन से ज्यादा वहाँ जीवित नहीं रहोगी। तुम्हारी माता के पास मेरे दिए हुए धन का जो हिस्सा रखा है, वह है। उसे समण-ब्राह्मणों को देकर यहीं उत्पन्न होने की प्रार्थना करना।" ऐसा कहकर उसे बाँह से पकड़कर गाँव के बीच में छोड़कर बोला - "यहाँ आने वाले दूसरे लोगों को भी 'जितना हो सके पुण्य करो' ऐसा उपदेश देना" और चला गया। इसी के बारे में कहा गया है -
“सो तं गहेत्वान पसय्ह बाहायं,
पच्चानयित्वान थेरिं सुदुब्बलं।
वज्जेसि ‘अञ्ञम्पि जनं इधागतं,
करोथ पुञ्ञानि सुखूपलब्भती’”ति॥
"वह (अमनुष्य) उस बहुत दुर्बल, बूढ़ी को ज़ोर से बाँह से पकड़कर वापस ले गया और कहा - "यहाँ आए हुए दूसरे लोगों से भी कहो कि पुण्य करो, सुख मिलेगा।"
ऐसा कहकर उसके चले जाने पर वह स्त्री अपने रिश्तेदारों के रहने की जगह पर गई, उन्हें अपना परिचय दिया, उनसे दिया हुआ धन लेकर समण-ब्राह्मणों को दान देने लगी, और अपने पास आने-जाने वालों को इस गाथा द्वारा उपदेश देने लगी–
“दिट्ठा मया अकतेन साधुना,
पेता विहञ्ञन्ति तथेव मनुस्सा।
कम्मञ्च कत्वा सुखवेदनीयं,
देवा मनुस्सा च सुखे ठिता पजा”ति॥
"मेरे द्वारा देखा गया है कि पुण्य न करने वाले बुरे लोग, प्रेत होकर और मनुष्य होकर भी दुख पाते हैं। और सुख देने वाले कर्म करके, देवता और मनुष्य के रूप में प्रजा सुख में स्थित रहती है।"
इस प्रकार उपदेश देते हुए उसने समण-ब्राह्मणों आदि के लिए सात दिन तक महादान चलाया और सातवें दिन मरकर तावतिंस देवलोक में उत्पन्न हुई। भिक्षुओं ने यह घटना भगवान को बताई। भगवान ने उस बात को अट्ठुप्पत्ति (अर्थ+उत्पत्ति = कारण की उत्पत्ति) करके वहाँ इकट्ठे हुए लोगों के समूह के लिए धर्म-उपदेश किया और विशेष रूप से पच्चेकबुद्धों को दिए गए दान का बड़ा फल और बड़ा शुभ परिणाम बताया। उसे सुनकर बहुत से लोग कंजूसी के मैल से मुक्त होकर दान आदि पुण्यों में लग गए।
🌸पेतवत्थु २.११, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
“दिवाविहारगतं भिक्खुं,
गङ्गातीरे निसिन्नकं।
तं पेती उपसङ्कम्म,
दुब्बण्णा भीरुदस्सना॥
"वह बदसूरत और भयानक दिखने वाली प्रेतनी दिन के विश्राम के लिए गंगा के किनारे बैठे हुए भिक्षु के पास गई।
“केसा चस्सा अतिदीघा,
यावभूमावलम्बरे।
केसेहि सा पटिच्छन्ना,
समणं एतदब्रवी”ति॥
"उसके बाल बहुत लंबे थे, ज़मीन तक लटकते थे, बालों से ढकी जाकर उसने श्रमण (=कंखारेवत स्थविर) से यह कहा-
उस प्रेतनी ने स्थविर के पास जाकर पानी मांगते हुए यह गाथा कही –
“पञ्चपण्णास वस्सानि,
यतो कालकता अहं।
नाभिजानामि भुत्तं वा,
पीतं वा पन पानियं।
देहि त्वं पानियं भन्ते,
तसिता पानियाय मे”ति॥
"पचपन वर्ष से जबसे मेरी मृत्यु हुई है, (तब से) मैं नहीं जानती कि मैंने कुछ खाया हो या फिर पानी पीया हो। भन्ते, मुझे पानी दें, मैं पानी के लिए प्यासी हूँ।"
इसके बाद यह प्रेतनी और स्थविर के बीच की वचन-प्रतिवचन वाली गाथाएँ हैं–
“अयं सीतोदिका गङ्गा,
हिमवन्ततो सन्दति।
पिव एत्तो गहेत्वान,
किं मं याचसि पानियं॥
(स्थविर) - "यह ठंडे पानी वाली गंगा हिमालय से बहकर आ रही है। यहीं से लेकर पी लो, मुझसे पानी क्यों माँग रही हो?
“सचाहं भन्ते गङ्गाय,
सयं गण्हामि पानियं।
लोहितं मे परिवत्तति,
तस्मा याचामि पानियं॥
"भन्ते, अगर मैं खुद गंगा से पानी लेती हूँ, तो वह मेरे लिए खून बन जाता है। इसलिए आपसे पानी माँग रही हूँ।
“किं नु कायेन वाचाय,
मनसा दुक्कटं कतं।
किस्सकम्मविपाकेन,
गङ्गा ते होति लोहितं॥
"तुमने शरीर, वाणी या मन द्वारा कौनसा गलत काम किया था? किस कर्म के फलस्वरूप गंगा तुम्हारे लिए खून बन जाती है?
“पुत्तो मे उत्तरो नाम,
सद्धो आसि उपासको।
सो च मय्हं अकामाय,
समणानं पवेच्छति॥
"मेरा उत्तर नाम का पुत्र था, वह श्रद्धावान उपासक था। वह मेरी इच्छा के बिना ही श्रमणों को दान देता था।
“चीवरं पिण्डपातञ्च,
पच्चयं सयनासनं।
तमहं परिभासामि,
मच्छेरेन उपद्दुता॥
"चीवर, पिण्डपात (भिक्षा-भोजन), दवाइयाँ, रहने की जगह - वह सब देता था। और मैं कंजूसी से जकड़ी हुई उसे गालियाँ देती थी।
“यं त्वं मय्हं अकामाय,
समणानं पवेच्छसि।
चीवरं पिण्डपातञ्च,
पच्चयं सयनासनं॥
"मैं कहती थी - जो तू मेरी मर्जी के बिना श्रमणों को चीवर, भिक्षा, दवाइयाँ, रहने की जगह देता है,
“एतं ते परलोकस्मिं,
लोहितं होतु उत्तर।
तस्सकम्मविपाकेन,
गङ्गा मे होति लोहित”न्ति॥
"उत्तर! वह परलोक में तेरे लिए खून बन जाए। उसी कर्म के फलस्वरूप गंगा मेरे लिए खून बन जाती है।
फिर अर्हन्त रेवत स्थविर ने उस प्रेतनी को उद्देश्य करके भिक्षु-संघ को पानी दिया, भिक्षा के लिए जाकर भोजन लाकर भिक्षुओं को दिया, कचरे के ढेर से पंसुकूल चीवर लेकर धोकर, उससे बिछौना और तकिया बनवाकर भिक्षुओं को दिया। उस पुण्य से उस प्रेतनी को दिव्य-संपत्ति मिल गईं। वह स्थविर के पास जाकर अपनी मिली हुई दिव्य-संपत्ति को स्थविर को दिखाने लगी। स्थविर ने यह सारी घटना अपने पास आई हुई चारों परिषदों को बताकर धम्म कथा कही। उससे बहुत से लोगों में संवेग पैदा हुआ, वे कंजूसी के मैल से मुक्त होकर दान, शील आदि कुशल-धर्मों में लग गए। यह प्रेतनी की कहानी दूसरी संगीति (=संगायन) में संग्रह में डाली गई थी, ऐसा समझना चाहिए।
🌸 पेतवत्थु २.१०, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
गङ्गातीरे निसिन्नकं।
तं पेती उपसङ्कम्म,
दुब्बण्णा भीरुदस्सना॥
"वह बदसूरत और भयानक दिखने वाली प्रेतनी दिन के विश्राम के लिए गंगा के किनारे बैठे हुए भिक्षु के पास गई।
“केसा चस्सा अतिदीघा,
यावभूमावलम्बरे।
केसेहि सा पटिच्छन्ना,
समणं एतदब्रवी”ति॥
"उसके बाल बहुत लंबे थे, ज़मीन तक लटकते थे, बालों से ढकी जाकर उसने श्रमण (=कंखारेवत स्थविर) से यह कहा-
उस प्रेतनी ने स्थविर के पास जाकर पानी मांगते हुए यह गाथा कही –
“पञ्चपण्णास वस्सानि,
यतो कालकता अहं।
नाभिजानामि भुत्तं वा,
पीतं वा पन पानियं।
देहि त्वं पानियं भन्ते,
तसिता पानियाय मे”ति॥
"पचपन वर्ष से जबसे मेरी मृत्यु हुई है, (तब से) मैं नहीं जानती कि मैंने कुछ खाया हो या फिर पानी पीया हो। भन्ते, मुझे पानी दें, मैं पानी के लिए प्यासी हूँ।"
इसके बाद यह प्रेतनी और स्थविर के बीच की वचन-प्रतिवचन वाली गाथाएँ हैं–
“अयं सीतोदिका गङ्गा,
हिमवन्ततो सन्दति।
पिव एत्तो गहेत्वान,
किं मं याचसि पानियं॥
(स्थविर) - "यह ठंडे पानी वाली गंगा हिमालय से बहकर आ रही है। यहीं से लेकर पी लो, मुझसे पानी क्यों माँग रही हो?
“सचाहं भन्ते गङ्गाय,
सयं गण्हामि पानियं।
लोहितं मे परिवत्तति,
तस्मा याचामि पानियं॥
"भन्ते, अगर मैं खुद गंगा से पानी लेती हूँ, तो वह मेरे लिए खून बन जाता है। इसलिए आपसे पानी माँग रही हूँ।
“किं नु कायेन वाचाय,
मनसा दुक्कटं कतं।
किस्सकम्मविपाकेन,
गङ्गा ते होति लोहितं॥
"तुमने शरीर, वाणी या मन द्वारा कौनसा गलत काम किया था? किस कर्म के फलस्वरूप गंगा तुम्हारे लिए खून बन जाती है?
“पुत्तो मे उत्तरो नाम,
सद्धो आसि उपासको।
सो च मय्हं अकामाय,
समणानं पवेच्छति॥
"मेरा उत्तर नाम का पुत्र था, वह श्रद्धावान उपासक था। वह मेरी इच्छा के बिना ही श्रमणों को दान देता था।
“चीवरं पिण्डपातञ्च,
पच्चयं सयनासनं।
तमहं परिभासामि,
मच्छेरेन उपद्दुता॥
"चीवर, पिण्डपात (भिक्षा-भोजन), दवाइयाँ, रहने की जगह - वह सब देता था। और मैं कंजूसी से जकड़ी हुई उसे गालियाँ देती थी।
“यं त्वं मय्हं अकामाय,
समणानं पवेच्छसि।
चीवरं पिण्डपातञ्च,
पच्चयं सयनासनं॥
"मैं कहती थी - जो तू मेरी मर्जी के बिना श्रमणों को चीवर, भिक्षा, दवाइयाँ, रहने की जगह देता है,
“एतं ते परलोकस्मिं,
लोहितं होतु उत्तर।
तस्सकम्मविपाकेन,
गङ्गा मे होति लोहित”न्ति॥
"उत्तर! वह परलोक में तेरे लिए खून बन जाए। उसी कर्म के फलस्वरूप गंगा मेरे लिए खून बन जाती है।
फिर अर्हन्त रेवत स्थविर ने उस प्रेतनी को उद्देश्य करके भिक्षु-संघ को पानी दिया, भिक्षा के लिए जाकर भोजन लाकर भिक्षुओं को दिया, कचरे के ढेर से पंसुकूल चीवर लेकर धोकर, उससे बिछौना और तकिया बनवाकर भिक्षुओं को दिया। उस पुण्य से उस प्रेतनी को दिव्य-संपत्ति मिल गईं। वह स्थविर के पास जाकर अपनी मिली हुई दिव्य-संपत्ति को स्थविर को दिखाने लगी। स्थविर ने यह सारी घटना अपने पास आई हुई चारों परिषदों को बताकर धम्म कथा कही। उससे बहुत से लोगों में संवेग पैदा हुआ, वे कंजूसी के मैल से मुक्त होकर दान, शील आदि कुशल-धर्मों में लग गए। यह प्रेतनी की कहानी दूसरी संगीति (=संगायन) में संग्रह में डाली गई थी, ऐसा समझना चाहिए।
🌸 पेतवत्थु २.१०, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
🌺उत्तरमातुपेतिवत्थु🌺 #petavatthu
'दिवाविहारगतं भिक्खुं...' - यह उत्तर की माता की पेत प्रेत कथा है।
यह उसके अर्थ की व्याख्या है-
शास्ता (बुद्ध जी) के परिनिर्वाण के बाद, जब पहली संगीति चल रही थी, तब अर्हन्त महाकच्चायन स्थविर बारह भिक्षुओं के साथ कोसंबी के पास एक जंगल में रह रहे थे। उस समय राजा उदेन का एक मंत्री मर गया। वह मंत्री पहले नगर के सारे काम देखता था। तब राजा ने उसके बेटे उत्तर नाम के युवक को बुलाया और कहा - "तुम अपने पिता की जगह नगर के काम संभालो" और उसे उसी पद पर रख दिया।
उत्तर ने "ठीक है" कहकर मान लिया। एक दिन वह नगर की मरम्मत के लिए लकड़ियों के लिए बढ़ईयों को लेकर जंगल गया। वहाँ उसने अर्हन्त महाकच्चायन स्थविर के रहने की जगह देखी। स्थविर को वहाँ फटे-पुराने चीवर पहने हुए अकेले बैठा देखकर, उनकी (चाल-ढाल) से ही वह बहुत प्रसन्न हो गया। उसने स्थविर का हाल-चाल पूछा और वंदना करके एक तरफ बैठ गया। स्थविर ने उसे धर्म बताया।
'दिवाविहारगतं भिक्खुं...' - यह उत्तर की माता की पेत प्रेत कथा है।
यह उसके अर्थ की व्याख्या है-
शास्ता (बुद्ध जी) के परिनिर्वाण के बाद, जब पहली संगीति चल रही थी, तब अर्हन्त महाकच्चायन स्थविर बारह भिक्षुओं के साथ कोसंबी के पास एक जंगल में रह रहे थे। उस समय राजा उदेन का एक मंत्री मर गया। वह मंत्री पहले नगर के सारे काम देखता था। तब राजा ने उसके बेटे उत्तर नाम के युवक को बुलाया और कहा - "तुम अपने पिता की जगह नगर के काम संभालो" और उसे उसी पद पर रख दिया।
उत्तर ने "ठीक है" कहकर मान लिया। एक दिन वह नगर की मरम्मत के लिए लकड़ियों के लिए बढ़ईयों को लेकर जंगल गया। वहाँ उसने अर्हन्त महाकच्चायन स्थविर के रहने की जगह देखी। स्थविर को वहाँ फटे-पुराने चीवर पहने हुए अकेले बैठा देखकर, उनकी (चाल-ढाल) से ही वह बहुत प्रसन्न हो गया। उसने स्थविर का हाल-चाल पूछा और वंदना करके एक तरफ बैठ गया। स्थविर ने उसे धर्म बताया।
धर्म सुनकर उसे बुद्ध, धम्म, संघ में श्रद्धा उत्पन्न हुई और उसने (तीन) शरणों में प्रतिष्ठित होकर स्थविर को निमंत्रण दिया - "भन्ते, कृपा करके कल भिक्षुओं के साथ मेरे यहाँ भोजन स्वीकार करें।"
स्थविर ने मौन रहकर स्वीकार किया। वह वहाँ से नगर में आकर दूसरे उपासकों से बोला - "मैंने स्थविर को कल के लिए बुलाया है, आप लोग भी मेरे दान देने के स्थान पर आइए।"
दूसरे दिन उसने सुबह-सुबह बढ़िया खाने-पीने की चीजें बनवाईं, समय की सूचना दी, और भिक्षुओं के साथ आते हुए स्थविर का बाहर जाकर स्वागत करके, वंदना करके, आगे होकर घर के अंदर प्रवेश करवाया। फिर उचित और कीमती कालीनों से सजे आसनों पर स्थविर और भिक्षुओं के बैठने पर, उसने गन्ध, फूल, धूप से पूजा की और अच्छे भोजन से उन्हें तृप्त करके बहुत श्रद्धा से हाथ जोड़कर उनका अनुमोदन सुना। जब स्थविर जाने लगे तो उनका पात्र लेकर नगर के बाहर तक उनके पीछे गया और लौटते हुए प्रार्थना की - "भन्ते, आप हमेशा मेरे घर आया करें।" स्थविर की स्वीकृति जानकर वह लौट आया। इस तरह स्थविर की सेवा करते हुए, उनके उपदेश पर चलकर उसने स्रोतापत्ति फल प्राप्त किया। उसने एक विहार भी बनवाया और अपने सारे रिश्तेदारों को भी बुद्ध-शासन के प्रति श्रद्धावान बना दिया।
पर उसकी माता कंजूसी के मैल से भरे मन वाली थी। वह उसे गाली देती हुई बोली - "जो तू मेरी मर्जी के बिना इन श्रमणों को अन्न-पानी देता है, वह परलोक में खून बन जाए।" बस एक बार विहार के धार्मिक उत्सव के दिन दिये जा रहे मोर की पूछ के पंखों को देने के लिए उसने हाँ कर दी थी। मरने के बाद वह प्रेत-योनि में उत्पन्न हुई। उस मोर-पंख के दान की अनुमति देने से उसके बाल नीले, चिकने, सिरों पर घुंघराले, मुलायम और लंबे हो गए। पर जब भी वह गंगा नदी में "पानी पीऊँगी" सोचकर उतरती, तब नदी खून से भर जाती। वह पचपन (55) साल तक भूख-प्यास से तड़पती हुई भटकती रही। एक दिन उसने अर्हन्त कंखारेवत स्थविर को गंगा किनारे दिन के विश्राम में बैठे हुए देखा। तो अपने आप को अपने ही बालों से ढककर उनके पास जाकर पानी माँगा। इसी घटना के सम्बंध में यह दो गाथाएँ शुरू में संगीतिकारकों (संगायन करने वाले महास्थविरों) के द्वारा डाली गई हैं –
स्थविर ने मौन रहकर स्वीकार किया। वह वहाँ से नगर में आकर दूसरे उपासकों से बोला - "मैंने स्थविर को कल के लिए बुलाया है, आप लोग भी मेरे दान देने के स्थान पर आइए।"
दूसरे दिन उसने सुबह-सुबह बढ़िया खाने-पीने की चीजें बनवाईं, समय की सूचना दी, और भिक्षुओं के साथ आते हुए स्थविर का बाहर जाकर स्वागत करके, वंदना करके, आगे होकर घर के अंदर प्रवेश करवाया। फिर उचित और कीमती कालीनों से सजे आसनों पर स्थविर और भिक्षुओं के बैठने पर, उसने गन्ध, फूल, धूप से पूजा की और अच्छे भोजन से उन्हें तृप्त करके बहुत श्रद्धा से हाथ जोड़कर उनका अनुमोदन सुना। जब स्थविर जाने लगे तो उनका पात्र लेकर नगर के बाहर तक उनके पीछे गया और लौटते हुए प्रार्थना की - "भन्ते, आप हमेशा मेरे घर आया करें।" स्थविर की स्वीकृति जानकर वह लौट आया। इस तरह स्थविर की सेवा करते हुए, उनके उपदेश पर चलकर उसने स्रोतापत्ति फल प्राप्त किया। उसने एक विहार भी बनवाया और अपने सारे रिश्तेदारों को भी बुद्ध-शासन के प्रति श्रद्धावान बना दिया।
पर उसकी माता कंजूसी के मैल से भरे मन वाली थी। वह उसे गाली देती हुई बोली - "जो तू मेरी मर्जी के बिना इन श्रमणों को अन्न-पानी देता है, वह परलोक में खून बन जाए।" बस एक बार विहार के धार्मिक उत्सव के दिन दिये जा रहे मोर की पूछ के पंखों को देने के लिए उसने हाँ कर दी थी। मरने के बाद वह प्रेत-योनि में उत्पन्न हुई। उस मोर-पंख के दान की अनुमति देने से उसके बाल नीले, चिकने, सिरों पर घुंघराले, मुलायम और लंबे हो गए। पर जब भी वह गंगा नदी में "पानी पीऊँगी" सोचकर उतरती, तब नदी खून से भर जाती। वह पचपन (55) साल तक भूख-प्यास से तड़पती हुई भटकती रही। एक दिन उसने अर्हन्त कंखारेवत स्थविर को गंगा किनारे दिन के विश्राम में बैठे हुए देखा। तो अपने आप को अपने ही बालों से ढककर उनके पास जाकर पानी माँगा। इसी घटना के सम्बंध में यह दो गाथाएँ शुरू में संगीतिकारकों (संगायन करने वाले महास्थविरों) के द्वारा डाली गई हैं –
Use this human life wisely | Yowun Daham Sakmana 2025 | Most Ven. Kiriba...
https://youtube.com/watch?v=jBnH4_vpLEc&si=NKrYaxB1T-5rszJ9
https://youtube.com/watch?v=jBnH4_vpLEc&si=NKrYaxB1T-5rszJ9
When Even a Perfect Life Feels Hollow… | Most Ven. Kiribathgoda Gnananan...
https://youtube.com/watch?v=135rWCxakrw&si=Z81Jfhl0PMUN4TPm
https://youtube.com/watch?v=135rWCxakrw&si=Z81Jfhl0PMUN4TPm
How the Supreme Buddha saved the city of Vaishali | Ven. Welimada Saddas...
https://youtube.com/watch?v=RUkyJbIwca0&si=k-rwAd76Svvp3Osg
https://youtube.com/watch?v=RUkyJbIwca0&si=k-rwAd76Svvp3Osg
“दस्सामन्नञ्च पानञ्च,
वत्थसेनासनानि च।
पपञ्च उदपानञ्च,
दुग्गे सङ्कमनानि चा”ति॥
“अन्न और पान दूँगा, वस्त्र-शयनासन दूँगा ,
प्याऊ और कुएँ (बनाऊंगा), दुर्गम स्थान पर पुल भी (बनाऊंगा)।”
इस प्रकार अंकुर द्वारा “मैं दान दूँगा” ऐसी प्रतिज्ञा किए जाने पर यक्ष ने संतुष्ट मन वाला होकर कहा, “मार्ष (मित्र), तुम निश्चिन्त हो दान दो, मैं तुम्हारा सहायक कार्य करूँगा, जिससे तुम्हारा देयधर्म (देने की चीज़ें) क्षय को न प्राप्त हो, उस प्रकार करूँगा” ऐसा कहकर उसे दानक्रिया में प्रोत्साहित करके (ब्राह्मण को कहा), “ब्राह्मण व्यापारी, तू तो मुझ जैसे को बलपूर्वक को ले जाने की इच्छा वाला अपने प्रमाण (limit) को नहीं जानता” ऐसा कहकर उसका भाण्ड (सामान) अन्तर्धान कराकर उसे यक्ष के डरावने रूप से डराते हुए धमकाया। फिर अंकुर ने नाना प्रकार से याचना करके ब्राह्मण से क्षमा मँगवाते हुए उसे प्रसन्न करवाकर सब भाण्ड (सामान) को पहले जैसा (प्रकट) करवाकर रात्रि आ जाने पर यक्ष को विदा करके जाते हुए उससे थोड़ी दूरी पर अत्यन्त भयानक दिखने वाले किसी प्रेत को देखकर उसके द्वारा किए गए कर्म के बारे में पूछते हुए गाथा कही –
“केन ते अङ्गुली कुणा,
मुखञ्च कुणलीकतं।
अक्खीनि च पग्घरन्ति,
किं पापं पकतं तया”ति॥
"किस (कारण) से तुम्हारी अँगुलियाँ टेढ़ी हैं, और मुँह टेढ़ा हुआ है। आँखें से भी (गंदगी) बह रही हैं, तुम्हारे द्वारा कौन सा पाप किया गया है?”
फिर प्रेत ने तीन गाथाएं कहीं–
“अङ्गीरसस्स गहपतिनो,
सद्धस्स घरमेसिनो।
तस्साहं दानविस्सग्गे,
दाने अधिकतो अहुं॥
“अङ्गीरस गृहपति (सेठ), श्रद्धालु गृहस्थ के दान-वितरण में मैं दान (बांटने) पर नियुक्त (incharge) था।
“तत्थ याचनके दिस्वा,
आगते भोजनत्थिके।
एकमन्तं अपक्कम्म,
अकासिं कुणलिं मुखं॥
"वहाँ याचकों को देखकर, भोजनार्थियों के आने पर, एक तरफ हटकर, मैंने मुँह टेढ़ा किया।
“तेन मे अङ्गुली कुणा,
मुखञ्च कुणलीकतं।
अक्खीनि मे पग्घरन्ति,
तं पापं पकतं मया”ति॥
"उस (कारण) से मेरी अँगुलियाँ टेढ़ी हैं, और मुँह टेढ़ा हुआ है। (उसी के कारण) मेरी आंखों (में से गन्दगी) बह रही हैं, वह पाप मेरे द्वारा किया गया था।”
उसे सुनकर अंकुर ने प्रेत को धिक्कारते हुए गाथा कही-
“धम्मेन ते कापुरिस,
मुखञ्च कुणलीकतं।
अक्खीनि च पग्घरन्ति,
यं तं परस्स दानस्स।
अकासि कुणलिं मुख”न्ति॥
“हे नीच पुरुष, धर्म (उचित कारण) से ही तेरा मुख टेढ़ा हुआ है। और आंखों (में से गन्दगी) बह रही हैं, क्योंकि तूने दूसरे के दान में मुँह टेढ़ा किया।”
फिर अंकुर ने उस दानपति सेठ की निंदा करते हुए गाथा कही –
“कथञ्हि दानं ददमानो,
करेय्य परपत्तियं।
अन्नपानं खादनीयं,
वत्थसेनासनानि चा”ति॥
"अन्न-पान, खाद्य पदार्थ, वस्त्र, शयनासन (सोने के लिए स्थान) का दान देते हुए कैसे किसी दूसरे पर निर्भर किया जा सकता है?”
इस प्रकार उसे धिक्कार कर अब अपने द्वारा आचरण करने योग्य विधि को दिखाते हुए दो गाथाएँ कहीं –
“सो हि नून इतो गन्त्वा,
अनुप्पत्वान द्वारकं।
दानं पट्ठपयिस्सामि,
यं ममस्स सुखावहं॥
“मैं निश्चय से यहाँ से जाकर, द्वारका पहुँचकर, दान स्थापित करूँगा, जो मेरे लिए सुखदायक हो।”
"दस्सामन्नञ्च पानञ्च,
वत्थसेनासनानि च।
पपञ्च उदपानञ्च,
दुग्गे सङ्कमनानि चा”ति॥
“अन्न और पान दूँगा, वस्त्र-शयनासन दूँगा ,
प्याऊ और कुएँ (बनाऊंगा), दुर्गम स्थान पर पुल भी (बनाऊंगा)।”
वत्थसेनासनानि च।
पपञ्च उदपानञ्च,
दुग्गे सङ्कमनानि चा”ति॥
“अन्न और पान दूँगा, वस्त्र-शयनासन दूँगा ,
प्याऊ और कुएँ (बनाऊंगा), दुर्गम स्थान पर पुल भी (बनाऊंगा)।”
इस प्रकार अंकुर द्वारा “मैं दान दूँगा” ऐसी प्रतिज्ञा किए जाने पर यक्ष ने संतुष्ट मन वाला होकर कहा, “मार्ष (मित्र), तुम निश्चिन्त हो दान दो, मैं तुम्हारा सहायक कार्य करूँगा, जिससे तुम्हारा देयधर्म (देने की चीज़ें) क्षय को न प्राप्त हो, उस प्रकार करूँगा” ऐसा कहकर उसे दानक्रिया में प्रोत्साहित करके (ब्राह्मण को कहा), “ब्राह्मण व्यापारी, तू तो मुझ जैसे को बलपूर्वक को ले जाने की इच्छा वाला अपने प्रमाण (limit) को नहीं जानता” ऐसा कहकर उसका भाण्ड (सामान) अन्तर्धान कराकर उसे यक्ष के डरावने रूप से डराते हुए धमकाया। फिर अंकुर ने नाना प्रकार से याचना करके ब्राह्मण से क्षमा मँगवाते हुए उसे प्रसन्न करवाकर सब भाण्ड (सामान) को पहले जैसा (प्रकट) करवाकर रात्रि आ जाने पर यक्ष को विदा करके जाते हुए उससे थोड़ी दूरी पर अत्यन्त भयानक दिखने वाले किसी प्रेत को देखकर उसके द्वारा किए गए कर्म के बारे में पूछते हुए गाथा कही –
“केन ते अङ्गुली कुणा,
मुखञ्च कुणलीकतं।
अक्खीनि च पग्घरन्ति,
किं पापं पकतं तया”ति॥
"किस (कारण) से तुम्हारी अँगुलियाँ टेढ़ी हैं, और मुँह टेढ़ा हुआ है। आँखें से भी (गंदगी) बह रही हैं, तुम्हारे द्वारा कौन सा पाप किया गया है?”
फिर प्रेत ने तीन गाथाएं कहीं–
“अङ्गीरसस्स गहपतिनो,
सद्धस्स घरमेसिनो।
तस्साहं दानविस्सग्गे,
दाने अधिकतो अहुं॥
“अङ्गीरस गृहपति (सेठ), श्रद्धालु गृहस्थ के दान-वितरण में मैं दान (बांटने) पर नियुक्त (incharge) था।
“तत्थ याचनके दिस्वा,
आगते भोजनत्थिके।
एकमन्तं अपक्कम्म,
अकासिं कुणलिं मुखं॥
"वहाँ याचकों को देखकर, भोजनार्थियों के आने पर, एक तरफ हटकर, मैंने मुँह टेढ़ा किया।
“तेन मे अङ्गुली कुणा,
मुखञ्च कुणलीकतं।
अक्खीनि मे पग्घरन्ति,
तं पापं पकतं मया”ति॥
"उस (कारण) से मेरी अँगुलियाँ टेढ़ी हैं, और मुँह टेढ़ा हुआ है। (उसी के कारण) मेरी आंखों (में से गन्दगी) बह रही हैं, वह पाप मेरे द्वारा किया गया था।”
उसे सुनकर अंकुर ने प्रेत को धिक्कारते हुए गाथा कही-
“धम्मेन ते कापुरिस,
मुखञ्च कुणलीकतं।
अक्खीनि च पग्घरन्ति,
यं तं परस्स दानस्स।
अकासि कुणलिं मुख”न्ति॥
“हे नीच पुरुष, धर्म (उचित कारण) से ही तेरा मुख टेढ़ा हुआ है। और आंखों (में से गन्दगी) बह रही हैं, क्योंकि तूने दूसरे के दान में मुँह टेढ़ा किया।”
फिर अंकुर ने उस दानपति सेठ की निंदा करते हुए गाथा कही –
“कथञ्हि दानं ददमानो,
करेय्य परपत्तियं।
अन्नपानं खादनीयं,
वत्थसेनासनानि चा”ति॥
"अन्न-पान, खाद्य पदार्थ, वस्त्र, शयनासन (सोने के लिए स्थान) का दान देते हुए कैसे किसी दूसरे पर निर्भर किया जा सकता है?”
इस प्रकार उसे धिक्कार कर अब अपने द्वारा आचरण करने योग्य विधि को दिखाते हुए दो गाथाएँ कहीं –
“सो हि नून इतो गन्त्वा,
अनुप्पत्वान द्वारकं।
दानं पट्ठपयिस्सामि,
यं ममस्स सुखावहं॥
“मैं निश्चय से यहाँ से जाकर, द्वारका पहुँचकर, दान स्थापित करूँगा, जो मेरे लिए सुखदायक हो।”
"दस्सामन्नञ्च पानञ्च,
वत्थसेनासनानि च।
पपञ्च उदपानञ्च,
दुग्गे सङ्कमनानि चा”ति॥
“अन्न और पान दूँगा, वस्त्र-शयनासन दूँगा ,
प्याऊ और कुएँ (बनाऊंगा), दुर्गम स्थान पर पुल भी (बनाऊंगा)।”
यह चार गाथाएँ अंकुर का आचरण दिखाने के लिए संगीतिकारकों (संगायन करने वाले महास्थविरों) के द्वारा डाली गई हैं –
“ततो हि सो निवत्तित्वा,
अनुप्पत्वान द्वारकं।
दानं पट्ठपयि अङ्कुरो,
यंतुमस्स सुखावहं॥
“तब उसने वहाँ से लौटकर, द्वारका वापस जाकर अंकुर ने दान स्थापित किया, जो उसके लिए सुखदायक था।
“अदा अन्नञ्च पानञ्च,
वत्थसेनासनानि च।
पपञ्च उदपानञ्च,
विप्पसन्नेन चेतसा॥
"(अंकुर ने) विप्रसन्न (बहुत प्रसन्न) चित्त से अन्न और पान (पेय पदार्थ दान में) दिया, वस्त्र-शयनासन भी, प्याऊ और कुएँ) भी।
“को छातो को च तसितो,
को वत्थं परिदहिस्सति।
कस्स सन्तानि योग्गानि,
इतो योजेन्तु वाहनं॥
"कौन भूखा है और कौन प्यासा है, कौन वस्त्र पहनेगा? किसके बैल थक चुके हैं? यहाँ से वाहन (गाड़ी) जोतो।
“को छत्तिच्छति गन्धञ्च,
को मालं को उपाहनं।
इतिस्सु तत्थ घोसेन्ति,
कप्पका सूदमागधा।
सदा सायञ्च पातो च,
अङ्गुरस्स निवेसने”ति॥
"किसको छाता और गन्ध चाहिए? किसको माला चाहिए, किसको जूता चाहिए? इस प्रकार नाई, रसोइए और मागध (इत्र बेचने वाले), सदा शाम और सुबह, वहाँ अंकुर के घर में घोषणा करते थे।”
इस प्रकार महादान प्रवर्तित करते हुए समय बीतने पर, तृप्त हो जाने के कारण वह दानशाला याचकों से रहित, विरल हो गई। उसे देखकर अंकुर ने दान में ऊँचा इरादा होने के कारण असंतुष्ट मन वाला होकर अपने दान में नियुक्त सिन्धक नामक माणव को आमंत्रित कर दो गाथाएँ कहीं –
“सुखं सुपति अङ्कुरो,
इति जानाति मं जनो।
दुक्खं सुपामि सिन्धक,
यं न पस्सामि याचके॥
“अंकुर सुख से सोता है, ऐसा मुझे लोग जानते हैं। मैं दुःख से सोता हूँ सिन्धक, क्योंकि मैं याचकों को नहीं देखता (=याचक नहीं आ रहे)।
“सुखं सुपति अङ्कुरो,
इति जानाति मं जनो।
दुक्खं सुपामि सिन्धक,
अप्पके सु वनिब्बके”ति॥
"अंकुर सुख से सोता है, ऐसा मुझे लोग जानते हैं। मैं दुःख से सोता हूँ सिन्धक, क्योंकि याचक थोड़े हैं।”
यह सुनकर सिन्धक ने दान के प्रति (अंकुर के) ऊँचे इरादे को और अधिक प्रकट करने की इच्छा से गाथा कही –
“सक्को चे ते वरं दज्जा,
तावतिंसानमिस्सरो।
किस्स सब्बस्स लोकस्स,
वरमानो वरं वरे”ति॥
“यदि तावतिंस (देवलोक) और सारी दुनिया के ईश्वर शक्र आपको वर (= वरदान) दें, तो माँगते हुए आप कौन सा वर माँगोगे?”
तब अंकुर ने अपने इरादे को यथावत् (सही मायने में) प्रकट करते हुए दो गाथाएँ कहीं –
“सक्को चे मे वरं दज्जा,
तावतिंसानमिस्सरो।
कालुट्ठितस्स मे सतो,
सूरियुग्गमनं पति।
दिब्बा भक्खा पातुभवेय्युं,
सीलवन्तो च याचका॥
“ददतो मे न खीयेथ,
दत्वा नानुतपेय्यहं।
ददं चित्तं पसादेय्यं,
एतं सक्कं वरं वरे”ति॥
“यदि तावतिंस के ईश्वर मुझे शक्र वर दें, तो सूर्योदय होने पर प्रातःकाल उठते ही मेरे लिए, दिव्य भोजन प्रकट हो, और शीलवान याचक (आएँ), देते हुए मेरा (धन) क्षीण (=खत्म) न हो, देकर पश्चाताप न करूँ, देते हुए चित्त प्रसन्न करूँ, मैं शक्र से यही वर माँगूँगा।”
“ततो हि सो निवत्तित्वा,
अनुप्पत्वान द्वारकं।
दानं पट्ठपयि अङ्कुरो,
यंतुमस्स सुखावहं॥
“तब उसने वहाँ से लौटकर, द्वारका वापस जाकर अंकुर ने दान स्थापित किया, जो उसके लिए सुखदायक था।
“अदा अन्नञ्च पानञ्च,
वत्थसेनासनानि च।
पपञ्च उदपानञ्च,
विप्पसन्नेन चेतसा॥
"(अंकुर ने) विप्रसन्न (बहुत प्रसन्न) चित्त से अन्न और पान (पेय पदार्थ दान में) दिया, वस्त्र-शयनासन भी, प्याऊ और कुएँ) भी।
“को छातो को च तसितो,
को वत्थं परिदहिस्सति।
कस्स सन्तानि योग्गानि,
इतो योजेन्तु वाहनं॥
"कौन भूखा है और कौन प्यासा है, कौन वस्त्र पहनेगा? किसके बैल थक चुके हैं? यहाँ से वाहन (गाड़ी) जोतो।
“को छत्तिच्छति गन्धञ्च,
को मालं को उपाहनं।
इतिस्सु तत्थ घोसेन्ति,
कप्पका सूदमागधा।
सदा सायञ्च पातो च,
अङ्गुरस्स निवेसने”ति॥
"किसको छाता और गन्ध चाहिए? किसको माला चाहिए, किसको जूता चाहिए? इस प्रकार नाई, रसोइए और मागध (इत्र बेचने वाले), सदा शाम और सुबह, वहाँ अंकुर के घर में घोषणा करते थे।”
इस प्रकार महादान प्रवर्तित करते हुए समय बीतने पर, तृप्त हो जाने के कारण वह दानशाला याचकों से रहित, विरल हो गई। उसे देखकर अंकुर ने दान में ऊँचा इरादा होने के कारण असंतुष्ट मन वाला होकर अपने दान में नियुक्त सिन्धक नामक माणव को आमंत्रित कर दो गाथाएँ कहीं –
“सुखं सुपति अङ्कुरो,
इति जानाति मं जनो।
दुक्खं सुपामि सिन्धक,
यं न पस्सामि याचके॥
“अंकुर सुख से सोता है, ऐसा मुझे लोग जानते हैं। मैं दुःख से सोता हूँ सिन्धक, क्योंकि मैं याचकों को नहीं देखता (=याचक नहीं आ रहे)।
“सुखं सुपति अङ्कुरो,
इति जानाति मं जनो।
दुक्खं सुपामि सिन्धक,
अप्पके सु वनिब्बके”ति॥
"अंकुर सुख से सोता है, ऐसा मुझे लोग जानते हैं। मैं दुःख से सोता हूँ सिन्धक, क्योंकि याचक थोड़े हैं।”
यह सुनकर सिन्धक ने दान के प्रति (अंकुर के) ऊँचे इरादे को और अधिक प्रकट करने की इच्छा से गाथा कही –
“सक्को चे ते वरं दज्जा,
तावतिंसानमिस्सरो।
किस्स सब्बस्स लोकस्स,
वरमानो वरं वरे”ति॥
“यदि तावतिंस (देवलोक) और सारी दुनिया के ईश्वर शक्र आपको वर (= वरदान) दें, तो माँगते हुए आप कौन सा वर माँगोगे?”
तब अंकुर ने अपने इरादे को यथावत् (सही मायने में) प्रकट करते हुए दो गाथाएँ कहीं –
“सक्को चे मे वरं दज्जा,
तावतिंसानमिस्सरो।
कालुट्ठितस्स मे सतो,
सूरियुग्गमनं पति।
दिब्बा भक्खा पातुभवेय्युं,
सीलवन्तो च याचका॥
“ददतो मे न खीयेथ,
दत्वा नानुतपेय्यहं।
ददं चित्तं पसादेय्यं,
एतं सक्कं वरं वरे”ति॥
“यदि तावतिंस के ईश्वर मुझे शक्र वर दें, तो सूर्योदय होने पर प्रातःकाल उठते ही मेरे लिए, दिव्य भोजन प्रकट हो, और शीलवान याचक (आएँ), देते हुए मेरा (धन) क्षीण (=खत्म) न हो, देकर पश्चाताप न करूँ, देते हुए चित्त प्रसन्न करूँ, मैं शक्र से यही वर माँगूँगा।”
इस प्रकार अंकुर द्वारा अपना इरादा प्रकट किए जाने पर, वहाँ बैठे हुए नीतिशास्त्र में परिचय प्राप्त सोनक नामक एक पुरुष ने उसे अति-दान से रोकने की इच्छा से दो गाथाएँ कहीं –
“न सब्बवित्तानि परे पवेच्छे,
ददेय्य दानञ्च धनञ्च रक्खे।
तस्मा हि दाना धनमेव सेय्यो,
अतिप्पदानेन कुला न होन्ति॥
“सब धन दूसरों को न दे दें, दान भी दें और धन की भी रक्षा करे। इसलिए दान से धन ही श्रेष्ठ है, अति-प्रदान (बहुत अधिक देने) से कुल (परिवार) नहीं रहते।
“अदानमतिदानञ्च नप्पसंसन्ति पण्डिता,
तस्मा हि दाना धनमेव सेय्यो,
समेन वत्तेय्य स धीरधम्मो”ति॥
"अदान (=दान न करना) और अतिदान (= अधिकता में देने ) की पंडित प्रशंसा नहीं करते, इसलिए दान से धन ही श्रेष्ठ है, समता से बर्ताव करें, यही धीर-धर्म (=बुद्धिमान लोगों का धर्म) है।”
यह सुनकर अंकुर ने उसके इरादे को पलटते हुए चार गाथाओं से अपने द्वारा आचरण करने योग्य विधि को प्रकाशित किया –
“अहो वत रे अहमेव दज्जं,
सन्तो च मं सप्पुरिसा भजेय्युं।
मेघोव निन्नानि परिपूरयन्तो,
सन्तप्पये सब्बवनिब्बकानं॥
“अहो, (तुम्हारे ऐसा कहने पर भी) मैं देना ही पसंद करूंगा, और संत-सत्पुरुष मेरा सेवन (=संगति) करें। निम्न प्रदेशों (lowland) को भरते हुए मेघ (बादल) के समान, मैं सब याचकों को संतृप्त (=संतुष्ट) करूँ।
“यस्स याचनके दिस्वा,
मुखवण्णो पसीदति।
दत्वा अत्तमनो होति,
तं घरं वसतो सुखं॥
"जिसका याचकों को देखकर मुख-वर्ण प्रसन्न होता है, देकर खुश होता है, उस घर में बसना सुख है।
“यस्स याचनके दिस्वा,
मुखवण्णो पसीदति।
दत्वा अत्तमनो होति,
एसा यञ्ञस्स सम्पदा॥
"जिसका याचकों को देखकर मुख-वर्ण प्रसन्न होता है, देकर खुश होता है, यही यज्ञ की सम्पदा (सफलता) है।
“पुब्बेव दाना सुमनो,
ददं चित्तं पसादये।
दत्वा अत्तमनो होति,
एसा यञ्ञस्स सम्पदा”ति॥
"दान से पहले ही प्रसन्न रहें, देते हुए चित्त प्रसन्न करें, देकर खुश हों, यही यज्ञ की सम्पदा है।”
इस प्रकार अंकुर ने अपने आचरण की विधि बताकर, और भी ज्यादा दान की भावना बढ़ने से, रोज़-रोज़ बड़ा दान (=महादान) चलाया। उस समय उसके महादान की वजह से सारे राज्य में खेती-बाड़ी का काम रुक गया, लोगों को दान से सब कुछ मिल गया, तो वे अपना-अपना काम-धंधा छोड़कर आराम से घूमने लगे। इससे राजाओं के खजाने और अनाज के गोदाम (धान्यागार) खाली होने लगे। तब राजाओं ने अंकुर के पास दूत भेजा – “आपके दान के कारण हमारी आमदनी खत्म हो रही है, हमारे गोदाम खाली हो गए हैं, इसमें (दान की) उचित मात्रा जाननी चाहिए।”
यह सुनकर अंकुर दक्षिणापथ (दक्षिण की ओर) चला गया और द्रविड़ देश में समुद्र के पास बहुत सी बड़ी-बड़ी दानशालाएँ बनवाकर महादान चलाते हुए जीवन भर वहीं रहा। मरने के बाद वह तावतिंस भवन में उत्पन्न हुआ।
उसकी दान की समृद्धि और स्वर्ग में उत्पत्ति को दिखाते हुए संगीतिकारकों (संगायन करने वाले महास्थविरों) ने गाथाएँ कहीं –
“न सब्बवित्तानि परे पवेच्छे,
ददेय्य दानञ्च धनञ्च रक्खे।
तस्मा हि दाना धनमेव सेय्यो,
अतिप्पदानेन कुला न होन्ति॥
“सब धन दूसरों को न दे दें, दान भी दें और धन की भी रक्षा करे। इसलिए दान से धन ही श्रेष्ठ है, अति-प्रदान (बहुत अधिक देने) से कुल (परिवार) नहीं रहते।
“अदानमतिदानञ्च नप्पसंसन्ति पण्डिता,
तस्मा हि दाना धनमेव सेय्यो,
समेन वत्तेय्य स धीरधम्मो”ति॥
"अदान (=दान न करना) और अतिदान (= अधिकता में देने ) की पंडित प्रशंसा नहीं करते, इसलिए दान से धन ही श्रेष्ठ है, समता से बर्ताव करें, यही धीर-धर्म (=बुद्धिमान लोगों का धर्म) है।”
यह सुनकर अंकुर ने उसके इरादे को पलटते हुए चार गाथाओं से अपने द्वारा आचरण करने योग्य विधि को प्रकाशित किया –
“अहो वत रे अहमेव दज्जं,
सन्तो च मं सप्पुरिसा भजेय्युं।
मेघोव निन्नानि परिपूरयन्तो,
सन्तप्पये सब्बवनिब्बकानं॥
“अहो, (तुम्हारे ऐसा कहने पर भी) मैं देना ही पसंद करूंगा, और संत-सत्पुरुष मेरा सेवन (=संगति) करें। निम्न प्रदेशों (lowland) को भरते हुए मेघ (बादल) के समान, मैं सब याचकों को संतृप्त (=संतुष्ट) करूँ।
“यस्स याचनके दिस्वा,
मुखवण्णो पसीदति।
दत्वा अत्तमनो होति,
तं घरं वसतो सुखं॥
"जिसका याचकों को देखकर मुख-वर्ण प्रसन्न होता है, देकर खुश होता है, उस घर में बसना सुख है।
“यस्स याचनके दिस्वा,
मुखवण्णो पसीदति।
दत्वा अत्तमनो होति,
एसा यञ्ञस्स सम्पदा॥
"जिसका याचकों को देखकर मुख-वर्ण प्रसन्न होता है, देकर खुश होता है, यही यज्ञ की सम्पदा (सफलता) है।
“पुब्बेव दाना सुमनो,
ददं चित्तं पसादये।
दत्वा अत्तमनो होति,
एसा यञ्ञस्स सम्पदा”ति॥
"दान से पहले ही प्रसन्न रहें, देते हुए चित्त प्रसन्न करें, देकर खुश हों, यही यज्ञ की सम्पदा है।”
इस प्रकार अंकुर ने अपने आचरण की विधि बताकर, और भी ज्यादा दान की भावना बढ़ने से, रोज़-रोज़ बड़ा दान (=महादान) चलाया। उस समय उसके महादान की वजह से सारे राज्य में खेती-बाड़ी का काम रुक गया, लोगों को दान से सब कुछ मिल गया, तो वे अपना-अपना काम-धंधा छोड़कर आराम से घूमने लगे। इससे राजाओं के खजाने और अनाज के गोदाम (धान्यागार) खाली होने लगे। तब राजाओं ने अंकुर के पास दूत भेजा – “आपके दान के कारण हमारी आमदनी खत्म हो रही है, हमारे गोदाम खाली हो गए हैं, इसमें (दान की) उचित मात्रा जाननी चाहिए।”
यह सुनकर अंकुर दक्षिणापथ (दक्षिण की ओर) चला गया और द्रविड़ देश में समुद्र के पास बहुत सी बड़ी-बड़ी दानशालाएँ बनवाकर महादान चलाते हुए जीवन भर वहीं रहा। मरने के बाद वह तावतिंस भवन में उत्पन्न हुआ।
उसकी दान की समृद्धि और स्वर्ग में उत्पत्ति को दिखाते हुए संगीतिकारकों (संगायन करने वाले महास्थविरों) ने गाथाएँ कहीं –
“सट्ठि वाहसहस्सानि,
अङ्कुरस्स निवेसने।
भोजनं दीयते निच्चं,
पुञ्ञपेक्खस्स जन्तुनो॥
“साठ हज़ार गाड़ियाँ भर भोजन पुण्य के प्रति झुकाव रखने वाले अंकुर के घर पर हमेशा दिया जाता था।
“तिसहस्सानि सूदा हि,
आमुत्तमणिकुण्डला।
अङ्कुरं उपजीवन्ति,
दाने यञ्ञस्स वावटा॥
"तीन हजार रसोइए, मणि-कुंडल पहने हुए, अंकुर के सहारे अपनी आजीविका चलाते थे, और दान-यज्ञ में लगे रहते थे।
“सट्ठि पुरिससहस्सानि,
आमुत्तमणिकुण्डला।
अङ्कुरस्स महादाने,
कट्ठं फालेन्ति माणवा॥
"साठ हजार पुरुष, मणि-कुंडल पहने हुए माणव (जवान लड़के), अंकुर के महादान में, लकड़ियाँ चीरते थे।
“सोळसित्थिसहस्सानि ,
सब्बालङ्कारभूसिता।
अङ्कुरस्स महादाने,
विधा पिण्डेन्ति नारियो॥
"सब अलंकारों से सजी हुई सोलह हजार स्त्रियाँ, अंकुर के महादान में, भोजन बनाती थीं।
“सोळसित्थिसहस्सानि,
सब्बालङ्कारभूसिता।
अङ्कुरस्स महादाने,
दब्बिगाहा उपट्ठिता॥
"सब अलंकारों से सजी हुई सोलह हजार स्त्रियाँ, अंकुर के महादान में, कड़छी लेकर सेवा में उपस्थित रहती थीं।
“बहुं बहूनं पादासि,
चिरं पादासि खत्तियो।
सक्कच्चञ्च सहत्था च,
चित्तीकत्वा पुनप्पुनं॥
"उस क्षत्रिय (अंकुर) ने बहुतों को बहुत कुछ दिया, लंबे समय तक दिया, आदर के साथ और अपने हाथों से, ध्यान से तथा बार-बार दिया।
“बहू मासे च पक्खे च,
उतुसंवच्छरानि च।
महादानं पवत्तेसि,
अङ्कुरो दीघमन्तरं॥
"कई महीनों और पक्षों तक, ऋतुओं और वर्षों तक, अंकुर ने बहुत लंबे समय तक, महादान चलाया।
“एवं दत्वा यजित्वा च,
अङ्कुरो दीघमन्तरं।
सो हित्वा मानुसं देहं,
तावतिंसूपगो अहू”ति॥
"इस प्रकार अंकुर ने लंबे समय तक दान देकर और यज्ञ किया, और वह मनुष्य देह को छोड़कर, तावतिंस (देवलोक) में उत्पन्न हुआ।”
इस प्रकार उसके तावतिंस लोक में उत्पन्न होकर दिव्य सम्पत्ति का अनुभव करते समय, हमारे भगवान (बुद्ध जी) के समय में इन्दक नामक माणव (जवान लड़के) ने पिंड के लिए घूमते हुए (भिक्षाटन करते हुए) अर्हन्त अनुरुद्ध स्थविर को प्रसन्न मन से चमचे भर भिक्षा दी। वह कुछ समय बाद मर कर, खेत (अनुपम पुण्य-क्षेत्र भिक्षु संघ) में दिए गए पुण्य के प्रभाव से, तावतिंस देवलोक में महा-ऋद्धिमान और महानुभाव देवपुत्र होकर उत्पन्न हुआ और दिव्य रूप आदि दस स्थानों (बातों) में अंकुर देवपुत्र से बढ़कर शोभित होता था। इसीलिए कहा गया है –
“कटच्छुभिक्खं दत्वान,
अनुरुद्धस्स इन्दको।
सो हित्वा मानुसं देहं,
तावतिंसूपगो अहु॥
“इन्दक ने अर्हन्त अनुरुद्ध स्थविर को कड़छी भर भिक्षा दी, (और) वह मनुष्य देह को छोड़कर, तावतिंस (देवलोक) में उत्पन्न हुआ।”
“दसहि ठानेहि अङ्कुरं,
इन्दको अतिरोचति।
रूपे सद्दे रसे गन्धे,
फोट्ठब्बे च मनोरमे॥
"दस बातों में इन्दक अंकुर से अधिक शोभित होता था - रूप में, शब्द में, रस में, गन्ध में,
और मनोरम स्पर्श में,
“आयुना यससा चेव,
वण्णेन च सुखेन च।
आधिपच्चेन अङ्कुरं,
इन्दको अतिरोचती”ति॥
"आयु से और यश से, वर्ण (रंग/सौंदर्य) से और सुख से, ऐश्वर्य (अधिपत्य) से इन्दक अंकुर से अधिक शोभित होता था।”
अङ्कुरस्स निवेसने।
भोजनं दीयते निच्चं,
पुञ्ञपेक्खस्स जन्तुनो॥
“साठ हज़ार गाड़ियाँ भर भोजन पुण्य के प्रति झुकाव रखने वाले अंकुर के घर पर हमेशा दिया जाता था।
“तिसहस्सानि सूदा हि,
आमुत्तमणिकुण्डला।
अङ्कुरं उपजीवन्ति,
दाने यञ्ञस्स वावटा॥
"तीन हजार रसोइए, मणि-कुंडल पहने हुए, अंकुर के सहारे अपनी आजीविका चलाते थे, और दान-यज्ञ में लगे रहते थे।
“सट्ठि पुरिससहस्सानि,
आमुत्तमणिकुण्डला।
अङ्कुरस्स महादाने,
कट्ठं फालेन्ति माणवा॥
"साठ हजार पुरुष, मणि-कुंडल पहने हुए माणव (जवान लड़के), अंकुर के महादान में, लकड़ियाँ चीरते थे।
“सोळसित्थिसहस्सानि ,
सब्बालङ्कारभूसिता।
अङ्कुरस्स महादाने,
विधा पिण्डेन्ति नारियो॥
"सब अलंकारों से सजी हुई सोलह हजार स्त्रियाँ, अंकुर के महादान में, भोजन बनाती थीं।
“सोळसित्थिसहस्सानि,
सब्बालङ्कारभूसिता।
अङ्कुरस्स महादाने,
दब्बिगाहा उपट्ठिता॥
"सब अलंकारों से सजी हुई सोलह हजार स्त्रियाँ, अंकुर के महादान में, कड़छी लेकर सेवा में उपस्थित रहती थीं।
“बहुं बहूनं पादासि,
चिरं पादासि खत्तियो।
सक्कच्चञ्च सहत्था च,
चित्तीकत्वा पुनप्पुनं॥
"उस क्षत्रिय (अंकुर) ने बहुतों को बहुत कुछ दिया, लंबे समय तक दिया, आदर के साथ और अपने हाथों से, ध्यान से तथा बार-बार दिया।
“बहू मासे च पक्खे च,
उतुसंवच्छरानि च।
महादानं पवत्तेसि,
अङ्कुरो दीघमन्तरं॥
"कई महीनों और पक्षों तक, ऋतुओं और वर्षों तक, अंकुर ने बहुत लंबे समय तक, महादान चलाया।
“एवं दत्वा यजित्वा च,
अङ्कुरो दीघमन्तरं।
सो हित्वा मानुसं देहं,
तावतिंसूपगो अहू”ति॥
"इस प्रकार अंकुर ने लंबे समय तक दान देकर और यज्ञ किया, और वह मनुष्य देह को छोड़कर, तावतिंस (देवलोक) में उत्पन्न हुआ।”
इस प्रकार उसके तावतिंस लोक में उत्पन्न होकर दिव्य सम्पत्ति का अनुभव करते समय, हमारे भगवान (बुद्ध जी) के समय में इन्दक नामक माणव (जवान लड़के) ने पिंड के लिए घूमते हुए (भिक्षाटन करते हुए) अर्हन्त अनुरुद्ध स्थविर को प्रसन्न मन से चमचे भर भिक्षा दी। वह कुछ समय बाद मर कर, खेत (अनुपम पुण्य-क्षेत्र भिक्षु संघ) में दिए गए पुण्य के प्रभाव से, तावतिंस देवलोक में महा-ऋद्धिमान और महानुभाव देवपुत्र होकर उत्पन्न हुआ और दिव्य रूप आदि दस स्थानों (बातों) में अंकुर देवपुत्र से बढ़कर शोभित होता था। इसीलिए कहा गया है –
“कटच्छुभिक्खं दत्वान,
अनुरुद्धस्स इन्दको।
सो हित्वा मानुसं देहं,
तावतिंसूपगो अहु॥
“इन्दक ने अर्हन्त अनुरुद्ध स्थविर को कड़छी भर भिक्षा दी, (और) वह मनुष्य देह को छोड़कर, तावतिंस (देवलोक) में उत्पन्न हुआ।”
“दसहि ठानेहि अङ्कुरं,
इन्दको अतिरोचति।
रूपे सद्दे रसे गन्धे,
फोट्ठब्बे च मनोरमे॥
"दस बातों में इन्दक अंकुर से अधिक शोभित होता था - रूप में, शब्द में, रस में, गन्ध में,
और मनोरम स्पर्श में,
“आयुना यससा चेव,
वण्णेन च सुखेन च।
आधिपच्चेन अङ्कुरं,
इन्दको अतिरोचती”ति॥
"आयु से और यश से, वर्ण (रंग/सौंदर्य) से और सुख से, ऐश्वर्य (अधिपत्य) से इन्दक अंकुर से अधिक शोभित होता था।”
इस प्रकार अंकुर और इन्दक के तावतिंस लोक में उत्पन्न होकर दिव्य सम्पत्ति भोगते समय, हमारे भगवान ने सम्बोधि प्राप्ति के सातवें वर्ष में आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन श्रावस्ती नगर के द्वार पर कण्डम्ब वृक्ष के नीचे यमक-प्रातिहार्य करके, क्रम से तीन कदम उठाकर तावतिंस भवन जाकर, पारिच्छत्तक (coral) वृक्ष के नीचे पण्डुकम्बल शिला पर, युगंधर पर्वत पर नए उभरे हुए सूर्य के समान शोभित होते हुए, दस-(हज़ार) लोकधातुओं से इकट्ठी हुई देव-ब्रह्मा की परिषद की चमक को अपने शरीर की प्रभा से मात देते (=outshine करते) हुए, अभिधम्म का उपदेश देने के लिए बैठे। तब पास में बैठे हुए इन्दक को और बारह योजन दूर बैठे हुए अंकुर को देखकर, दक्षिणा (दान) के योग्य पात्र की महिमा दिखाने के लिए गाथा कही –
“महादानं तया दिन्नं,
अङ्कुर दीघमन्तरं।
अतिदूरे निसिन्नोसि,
आगच्छ मम सन्तिके”ति॥
"अंकुर, तुमने बहुत लंबे समय तक महादान दिया था। तुम बहुत दूर बैठे हो, मेरे पास आओ।"
यह सुनकर अंकुर ने कहा – “भगवान, मैंने चिरकाल तक बहुत सारा दान का सामान त्याग करके जो महादान चलाया था, वह (पुण्य) दान के योग्य (दक्षिणेय) पात्र न मिलने के कारण, बंजर जमीन में बोये हुए बीज की तरह बड़ा फल नहीं दे पाया। लेकिन इन्दक का कड़छी भर भिक्षा का दान भी, उत्तम पात्र (=अर्हन्त अनुरुद्ध स्थविर) मिलने से, अच्छी उपजाऊ जमीन में बोये हुए बीज की तरह बहुत ही बड़ा फल देने वाला हो गया।” उस बात को दर्शाते हुए संगीतिकारकों (संगायन करने वाले महास्थविरों) ने यह गाथाएँ कहीं–
“तावतिंसे यदा बुद्धो,
सिलायं पण्डुकम्बले।
पारिच्छत्तयमूलम्हि,
विहासि पुरिसुत्तमो॥
"जब तावतिंस (देवलोक) में उत्तम पुरुष बुद्ध जी, पांडुकम्बल शिला पर, पारिछत्तक वृक्ष के नीचे, विहार कर रहे थे।
“दससु लोकधातूसु,
सन्निपतित्वान देवता।
पयिरुपासन्ति सम्बुद्धं,
वसन्तं नगमुद्धनि॥
"(उस समय) दस-(हज़ार) लोकधातुओं से, सभी देवता इकट्ठा होकर, सम्बुद्ध की सेवा कर रहे थे, जो (सुमेरु) पर्वत के शिखर पर निवास कर रहे थे।
“न कोचि देवो वण्णेन,
सम्बुद्धं अतिरोचति।
सब्बे देवे अतिक्कम्म,
सम्बुद्धोव विरोचति॥
"कोई भी देवता अपने वर्ण (तेज) से,
सम्बुद्ध से अधिक नहीं चमक रहा था।
सभी देवताओं को पीछे छोड़कर,
केवल सम्बुद्ध ही शोभित हो रहे थे।
“योजनानि दस द्वे च,
अङ्कुरोयं तदा अहु।
अविदूरेव बुद्धस्स,
इन्दको अतिरोचति॥
"उस समय अंकुर (देवपुत्र, बुद्ध जी से) बारह योजन दूर था, और बुद्ध जी के पास में ही, इन्दक अधिक शोभित हो रहा था।
“ओलोकेत्वान सम्बुद्धो,
अङ्कुरञ्चापि इन्दकं।
दक्खिणेय्यं सम्भावेन्तो,
इदं वचनमब्रवि॥
"सम्बुद्ध ने अंकुर और इन्दक दोनों को देखकर, दान के योग्य पात्र की महिमा को दिखाते हुए, यह वचन कहा —
“महादानं तया दिन्नं,
अङ्कुरं दीघमन्तरं।
अतिदूरे निसिन्नोसि,
आगच्छ मम सन्तिके॥
"अंकुर, तुमने बहुत लंबे समय तक महादान दिया था। तुम बहुत दूर बैठे हो, मेरे पास आओ।
“चोदितो भावितत्तेन,
अङ्कुरो इदमब्रवि।
किं मय्हं तेन दानेन,
दक्खिणेय्येन सुञ्ञतं॥
"भावितात्म (बुद्ध) द्वारा प्रेरित होकर, अंकुर ने यह कहा — “उस दान से मेरा क्या लाभ, जो उत्तम पात्र से खाली (रहित) था।
“अयं सो इन्दको यक्खो,
दज्जा दानं परित्तकं।
अतिरोचति अम्हेहि,
चन्दो तारगणे यथा॥
"यह इन्दक नामक यक्ष (देव), जिसने थोड़ा सा दान दिया था, हमसे अधिक शोभित हो रहा है, जैसे तारों के बीच चाँद।
“उज्जङ्गले यथा खेत्ते,
बीजं बहुम्पि रोपितं।
न विपुलं फलं होति,
नपि तोसेति कस्सकं॥
"जैसे बंजर जमीन वाले खेत में, बहुत सारा बीज भी बोया जाए, तो बड़ा फल नहीं होता, और किसान को संतोष भी नहीं होता।
“तथेव दानं बहुकं,
दुस्सीलेसु पतिट्ठितं।
न विपुलं फलं होति,
नपि तोसेति दायकं॥
"वैसे ही बहुत सारा दान भी, यदि दुराचारी (दुःशील) लोगों को दिया जाए, तो बड़ा फल नहीं होता, और दाता (देने वाले) को संतोष भी नहीं देता।
“यथापि भद्दके खेत्ते,
बीजं अप्पम्पि रोपितं।
सम्मा धारं पवेच्छन्ते,
फलं तोसेसि कस्सकं॥
"जैसे अच्छी उपजाऊ जमीन में, थोड़ा सा भी बीज बोया जाए, और सही समय पर वर्षा हो जाए, तो फल किसान को संतुष्ट कर देता है।
“तथेव सीलवन्तेसु,
गुणवन्तेसु तादिसु।
अप्पकम्पि कतं कारं,
पुञ्ञं होति महप्फल”न्ति॥
"वैसे ही शीलवान, वैसे ही गुणवान लोगों के प्रति थोड़ा सा भी किया गया सत्कार, महान फल वाला पुण्य होता है।”
“महादानं तया दिन्नं,
अङ्कुर दीघमन्तरं।
अतिदूरे निसिन्नोसि,
आगच्छ मम सन्तिके”ति॥
"अंकुर, तुमने बहुत लंबे समय तक महादान दिया था। तुम बहुत दूर बैठे हो, मेरे पास आओ।"
यह सुनकर अंकुर ने कहा – “भगवान, मैंने चिरकाल तक बहुत सारा दान का सामान त्याग करके जो महादान चलाया था, वह (पुण्य) दान के योग्य (दक्षिणेय) पात्र न मिलने के कारण, बंजर जमीन में बोये हुए बीज की तरह बड़ा फल नहीं दे पाया। लेकिन इन्दक का कड़छी भर भिक्षा का दान भी, उत्तम पात्र (=अर्हन्त अनुरुद्ध स्थविर) मिलने से, अच्छी उपजाऊ जमीन में बोये हुए बीज की तरह बहुत ही बड़ा फल देने वाला हो गया।” उस बात को दर्शाते हुए संगीतिकारकों (संगायन करने वाले महास्थविरों) ने यह गाथाएँ कहीं–
“तावतिंसे यदा बुद्धो,
सिलायं पण्डुकम्बले।
पारिच्छत्तयमूलम्हि,
विहासि पुरिसुत्तमो॥
"जब तावतिंस (देवलोक) में उत्तम पुरुष बुद्ध जी, पांडुकम्बल शिला पर, पारिछत्तक वृक्ष के नीचे, विहार कर रहे थे।
“दससु लोकधातूसु,
सन्निपतित्वान देवता।
पयिरुपासन्ति सम्बुद्धं,
वसन्तं नगमुद्धनि॥
"(उस समय) दस-(हज़ार) लोकधातुओं से, सभी देवता इकट्ठा होकर, सम्बुद्ध की सेवा कर रहे थे, जो (सुमेरु) पर्वत के शिखर पर निवास कर रहे थे।
“न कोचि देवो वण्णेन,
सम्बुद्धं अतिरोचति।
सब्बे देवे अतिक्कम्म,
सम्बुद्धोव विरोचति॥
"कोई भी देवता अपने वर्ण (तेज) से,
सम्बुद्ध से अधिक नहीं चमक रहा था।
सभी देवताओं को पीछे छोड़कर,
केवल सम्बुद्ध ही शोभित हो रहे थे।
“योजनानि दस द्वे च,
अङ्कुरोयं तदा अहु।
अविदूरेव बुद्धस्स,
इन्दको अतिरोचति॥
"उस समय अंकुर (देवपुत्र, बुद्ध जी से) बारह योजन दूर था, और बुद्ध जी के पास में ही, इन्दक अधिक शोभित हो रहा था।
“ओलोकेत्वान सम्बुद्धो,
अङ्कुरञ्चापि इन्दकं।
दक्खिणेय्यं सम्भावेन्तो,
इदं वचनमब्रवि॥
"सम्बुद्ध ने अंकुर और इन्दक दोनों को देखकर, दान के योग्य पात्र की महिमा को दिखाते हुए, यह वचन कहा —
“महादानं तया दिन्नं,
अङ्कुरं दीघमन्तरं।
अतिदूरे निसिन्नोसि,
आगच्छ मम सन्तिके॥
"अंकुर, तुमने बहुत लंबे समय तक महादान दिया था। तुम बहुत दूर बैठे हो, मेरे पास आओ।
“चोदितो भावितत्तेन,
अङ्कुरो इदमब्रवि।
किं मय्हं तेन दानेन,
दक्खिणेय्येन सुञ्ञतं॥
"भावितात्म (बुद्ध) द्वारा प्रेरित होकर, अंकुर ने यह कहा — “उस दान से मेरा क्या लाभ, जो उत्तम पात्र से खाली (रहित) था।
“अयं सो इन्दको यक्खो,
दज्जा दानं परित्तकं।
अतिरोचति अम्हेहि,
चन्दो तारगणे यथा॥
"यह इन्दक नामक यक्ष (देव), जिसने थोड़ा सा दान दिया था, हमसे अधिक शोभित हो रहा है, जैसे तारों के बीच चाँद।
“उज्जङ्गले यथा खेत्ते,
बीजं बहुम्पि रोपितं।
न विपुलं फलं होति,
नपि तोसेति कस्सकं॥
"जैसे बंजर जमीन वाले खेत में, बहुत सारा बीज भी बोया जाए, तो बड़ा फल नहीं होता, और किसान को संतोष भी नहीं होता।
“तथेव दानं बहुकं,
दुस्सीलेसु पतिट्ठितं।
न विपुलं फलं होति,
नपि तोसेति दायकं॥
"वैसे ही बहुत सारा दान भी, यदि दुराचारी (दुःशील) लोगों को दिया जाए, तो बड़ा फल नहीं होता, और दाता (देने वाले) को संतोष भी नहीं देता।
“यथापि भद्दके खेत्ते,
बीजं अप्पम्पि रोपितं।
सम्मा धारं पवेच्छन्ते,
फलं तोसेसि कस्सकं॥
"जैसे अच्छी उपजाऊ जमीन में, थोड़ा सा भी बीज बोया जाए, और सही समय पर वर्षा हो जाए, तो फल किसान को संतुष्ट कर देता है।
“तथेव सीलवन्तेसु,
गुणवन्तेसु तादिसु।
अप्पकम्पि कतं कारं,
पुञ्ञं होति महप्फल”न्ति॥
"वैसे ही शीलवान, वैसे ही गुणवान लोगों के प्रति थोड़ा सा भी किया गया सत्कार, महान फल वाला पुण्य होता है।”
यह संगीतिकारकों (संगायन करने वाले महास्थविरों) द्वारा डाली गई गाथाएँ हैं -
“विचेय्य दानं दातब्बं,
यत्थ दिन्नं महप्फलं।
विचेय्य दानं दत्वान,
सग्गं गच्छन्ति दायका॥
"सोच-विचार कर दान देना चाहिए, जहाँ दिया हुआ दान महान फल वाला हो। सोच-विचार कर दान देकर, दान देने वाले स्वर्ग को जाते हैं।
“विचेय्य दानं सुगतप्पसट्ठं,
ये दक्खिणेय्या इध जीवलोके।
एतेसु दिन्नानि महप्फलानि,
बीजानि वुत्तानि यथा सुखेत्ते”ति॥
"सोच-विचार कर दिया गया दान सुगत (बुद्ध) द्वारा प्रशंसित है, जो इस जीवलोक में दान के योग्य (दक्षिणेय) हैं। उन्हें दिया हुआ दान महान फल वाला होता है, जैसे अच्छे खेत में बोए हुए बीज।"
यह अंकुर-पेततवत्थु (कथा) शास्ता (बुद्ध) ने स्वयं तावतिंस भवन में दस हजार चक्रवालों के देवताओं के सामने, दान के योग्य पात्र की महिमा दिखाने के लिए “महादानं तया दिन्नं” आदि गाथा से स्वयं उठाई थी।
वहाँ तीन महीने तक अभिधर्म का उपदेश देकर, महापवारणा के दिन देवताओं के समूह से घिरे हुए देवों के देव (बुद्ध) देवलोक से संकस्स नगर में उतरे, और क्रमशः श्रावस्ती पहुँचकर जेतवन में विहार करते हुए, चारों परिषदों (भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक, उपासिका) के बीच में दान के योग्य पात्र की महिमा दिखाने के लिए ही “यस्स अत्थाय गच्छाम” आदि से विस्तार से उपदेश देकर, चार आर्यसत्यों की कथा से देशना के निष्कर्ष तक पहुँचे। देशना के अंत में अनेक हज़ार कोटि प्राणियों को धर्म का साक्षात्कार (धर्माभिसमय) हुआ।
🌸 पेतवत्थु २.९, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
“विचेय्य दानं दातब्बं,
यत्थ दिन्नं महप्फलं।
विचेय्य दानं दत्वान,
सग्गं गच्छन्ति दायका॥
"सोच-विचार कर दान देना चाहिए, जहाँ दिया हुआ दान महान फल वाला हो। सोच-विचार कर दान देकर, दान देने वाले स्वर्ग को जाते हैं।
“विचेय्य दानं सुगतप्पसट्ठं,
ये दक्खिणेय्या इध जीवलोके।
एतेसु दिन्नानि महप्फलानि,
बीजानि वुत्तानि यथा सुखेत्ते”ति॥
"सोच-विचार कर दिया गया दान सुगत (बुद्ध) द्वारा प्रशंसित है, जो इस जीवलोक में दान के योग्य (दक्षिणेय) हैं। उन्हें दिया हुआ दान महान फल वाला होता है, जैसे अच्छे खेत में बोए हुए बीज।"
यह अंकुर-पेततवत्थु (कथा) शास्ता (बुद्ध) ने स्वयं तावतिंस भवन में दस हजार चक्रवालों के देवताओं के सामने, दान के योग्य पात्र की महिमा दिखाने के लिए “महादानं तया दिन्नं” आदि गाथा से स्वयं उठाई थी।
वहाँ तीन महीने तक अभिधर्म का उपदेश देकर, महापवारणा के दिन देवताओं के समूह से घिरे हुए देवों के देव (बुद्ध) देवलोक से संकस्स नगर में उतरे, और क्रमशः श्रावस्ती पहुँचकर जेतवन में विहार करते हुए, चारों परिषदों (भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक, उपासिका) के बीच में दान के योग्य पात्र की महिमा दिखाने के लिए ही “यस्स अत्थाय गच्छाम” आदि से विस्तार से उपदेश देकर, चार आर्यसत्यों की कथा से देशना के निष्कर्ष तक पहुँचे। देशना के अंत में अनेक हज़ार कोटि प्राणियों को धर्म का साक्षात्कार (धर्माभिसमय) हुआ।
🌸 पेतवत्थु २.९, खुद्दकनिकाय, सुत्तपिटक
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